Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 9

34 Mantra
2/9
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
अग्ने॒ वेर्हो॒त्रं वेर्दू॒त्यमव॑तां॒ त्वां द्यावा॑पृथि॒वीऽअव॒ त्वं द्यावा॑पृथि॒वी स्वि॑ष्ट॒कृद्दे॒वेभ्य॒ऽइन्द्र॒ऽआज्ज्ये॑न ह॒विषा॑ भू॒त्स्वाहा॒ सं ज्योति॑षा॒ ज्योतिः॑॥९॥

अग्नेः॑। वेः। हो॒त्रम्। वेः। दू॒त्य᳖म्। अव॑ताम्। त्वाम्। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑ऽपृथि॒वी। अव॑। त्वम्। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑ऽपृथि॒वी। स्वि॒ष्ट॒कृदिति॑ स्विष्ट॒ऽकृत्। दे॒वेभ्यः॑। इन्द्रः॑। आज्ये॑न। ह॒विषा॑। भू॒त्। स्वाहा॑। सम्। ज्योति॑षा। ज्योतिः॑ ॥९॥

Mantra without Swara
अग्ने वेर्हात्रँवेर्दूत्यम् अवतांन्त्वान्द्यावापृथिवीऽअव त्वन्द्यावापृथिवी स्विष्टकृद्देवेभ्यऽइन्द्रऽआज्येन हविषा भूत्स्वाहा सञ्ज्योतिषा ज्योतिः ॥

अग्नेः। वेः। होत्रम्। वेः। दूत्यम्। अवताम्। त्वाम्। द्यावापृथिवीऽइति द्यावाऽपृथिवी। अव। त्वम्। द्यावापृथिवीऽइति द्यावाऽपृथिवी। स्विष्टकृदिति स्विष्टऽकृत्। देवेभ्यः। इन्द्रः। आज्येन। हविषा। भूत्। स्वाहा। सम्। ज्योतिषा। ज्योतिः॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु अपने उपासक से कहते हैं कि  १. ( अग्ने ) = हे उन्नति-पथ पर चलनेवाले जीव! ( होत्रम् ) = अग्निहोत्र को—देवयज्ञ को—देवताओं को देकर यज्ञशेष के खाने की वृत्ति को तू ( वेः ) = अपने अन्दर प्रेरित कर [ वी = गति, वीर् गतौ ]। तू सदा यज्ञ करनेवाला बन। 

२. ( दूत्यम् ) = दूत कर्म को तू ( वेः ) = अपने में प्रेरित कर। जैसे दूत सन्देश-वहन का काम करता है, उसी प्रकार तू प्रभु के सन्देश-वहन के कार्य को करनेवाला बन। प्रभु की दी हुई इस वेदवाणी को पढ़ता हुआ तू इसका सन्देश औरों को सुनानेवाला बन। वस्तुतः ब्रह्मयज्ञ तो यही है। 

३. इन यज्ञों को ठीक से चलाने के लिए ( द्यावापृथिवी ) = [ मूर्ध्नो द्यौः, पृथिवी शरीरम् ] मस्तिष्क व शरीर ( त्वा ) = तेरा ( अवताम् ) = रक्षण करें। ( त्वम् ) = तू भी ( द्यावापृथिवी ) = इन मस्तिष्क व शरीर का ( अव ) = रक्षण कर। तू इनका ध्यान कर, ये तेरा ध्यान करें। स्वस्थ मस्तिष्क व शरीर मनुष्य की सब क्रियाओं के साधक होते हैं, अतः मनुष्य को भी इनका पूरा ध्यान रखना है।

४. मस्तिष्क व शरीर को स्वस्थ रखनेवाला ( इन्द्रः ) = यह जितेन्द्रिय पुरुष ( देवेभ्यः ) = अग्नि, वायु आदि देवों के लिए ( आज्येन ) = घृत से तथा ( हविषा ) = हविर्द्रव्यों से, सामग्री आदि से ( स्विष्टकृत् ) = [ सु+इष्ट+कृत् ] उत्तम यज्ञों को करनेवाला ( भूत् ) = हो। मस्तिष्क व शरीर के स्वास्थ्य का रहस्य ‘इन्द्र’ शब्द से व्यक्त हो रहा है। ‘इन्द्रः’ का अर्थ है जितेन्द्रिय। जितेन्द्रियता ही स्वास्थ्य का मूल मन्त्र है। यह जितेन्द्रिय पुरुष कभी स्वादवश न खाएगा और न रोगी होगा। ‘रसमूला हि व्याधयः’— स्वाद ही बीमारियों का मूल है। ( स्वाहा ) = यह ‘स्व’ स्वार्थ का ‘हा’ = त्याग तो उसमें सदा बना ही रहे। 

५. हे इन्द्र! तू  ( ज्योतिषा ) = ज्योति के द्वारा ( ज्योतिः सम् ) [ गच्छस्व ] = ज्योति को प्राप्त करनेवाला बन। सदा ज्ञानियों के सम्पर्क में आकर तू अपने ज्ञान को बढ़ा और ज्ञानवृद्ध होकर इस ज्ञान के सन्देश को दूसरों तक पहुँचानेवाला बन। इस प्रकार तेरा जीवन ‘होत्र व दूत्य’ से परिपूर्ण हो।
Essence
भावार्थ — हम स्वस्थ शरीरवाले बनकर यज्ञ आदि कर्मों में निरत रहें और स्वस्थ मस्तिष्कवाले बनकर प्रभु की ज्ञान-ज्योति को प्राप्त करने व करानेवाले बनें।
Subject
होत्रं, दूत्यम् [ देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ ]