Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 4

34 Mantra
2/4
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृत् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वी॒तिहो॑त्रं त्वा कवे द्यु॒मन्त॒ꣳ समि॑धीमहि। अग्ने॑ बृ॒हन्त॑मध्व॒रे॥४॥

वी॒तिहो॑त्र॒मिति॑ वी॒तिऽहो॑त्रम्। त्वा॒। क॒वे॒। द्यु॒मन्त॒मिति॑ द्यु॒ऽमन्त॒म्। सम्। इ॒धी॒म॒हि॒। अग्ने॑। बृ॒हन्त॑म्। अ॒ध्व॒रे ॥४॥

Mantra without Swara
वीतिहोत्रन्त्वा कवे द्युमन्तँ समिधीमहि । अग्ने बृहन्तमध्वरे ॥

वीतिहोत्रमिति वीतिऽहोत्रम्। त्वा। कवे। द्युमन्तमिति द्युऽमन्तम्। सम्। इधीमहि। अग्ने। बृहन्तम्। अध्वरे॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र की समाप्ति ‘ईडितः’ शब्द पर है, जिसका अर्थ है स्तुतिवाला। वही स्तुति प्रस्तुत मन्त्र में चलती है—हे ( कवे ) = [ कौति सर्वा विद्याः, कु शब्दे ] सब विद्याओं का उपदेश देनेवाले, ( अग्ने ) = सबकी उन्नति के साधक प्रभो! हम ( अध्वरे ) = अपने इस हिंसा व कुटिलताशून्य जीवन में [ ध्वरः हिंसा व कुटिलता ] ( त्वा ) = आपको ( समिधीमहि ) = दीप्त करने का प्रयत्न करते हैं, जो आप [ क ] ( वीतिहोत्रम् ) = [ वीति = प्रकाश, होत्रा = वाक् ] प्रकाशमय वाणीवाले हैं। आपकी यह वेदवाणी हमारे जीवन के अन्धकार को नष्ट करके उन्हें प्रकाशमय बनाती है, [ ख ] ( द्युमन्तम् ) =  ज्योतिर्मय हैं। ‘आदित्यवर्णम्’ सूर्य के समान आपका वर्ण है। इस सूर्य के समान ही क्या ? ( दिवि सूर्यसहस्रस्य ) = हज़ारों सूर्यों की समुदित ज्योति के समान आपकी ज्योति है। वस्तुतः आपकी ज्योति से ही तो यह सब पिण्ड ज्योतिर्मय हो रहे हैं। तस्य भासा सर्वमिदं विभाति, [ ग ] ( बृहन्तम् ) = आप बृहत् हैं [ बृहि वृद्धौ ], सदा वर्धमान है। आप विशाल-से-विशाल हैं। सारे प्राणियों के आप निवास-स्थान हैं। सर्वत्र समरूप से आप अवस्थित हैं।

इस प्रकार आपका स्तवन करता हुआ मैं भी प्रकाशमय वाणीवाला [ वीतिहोत्र ] बनूँ। मेरी वाणी सदा लोगों के ज्ञान की वृद्धि का हेतु बने। मेरा जीवन प्रकाशमय हो [ द्युमान् ], मेरा हृदय विशाल हो। आपकी वेदवाणी का प्रसार करता हुआ मैं भी कवि बनूँ। निरन्तर उन्नति-पथ पर चलता हुआ और औरों को आगे ले-चलता हुआ मैं भी आपकी भाँति अग्नि बनूँ।
Essence
भावार्थ — प्रभु-स्तवन हमारे सामने इस ऊँचे लक्ष्य को रक्खे कि हम ‘प्रकाशमय वाणीवाले, ज्योतिर्मय जीवनवाले और विशाल हृदय’ बनें। हम आगे बढ़नेवाले ‘अग्नि’ हों और विद्या का प्रकाश करनेवाले ‘कवि’ हों।
Subject
प्रभु-स्तवन