Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 34

34 Mantra
2/34
Devata- आपो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भूरिक् उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ऊर्जं॒ वह॑न्तीर॒मृतं॑ घृ॒तं पयः॑ की॒लालं॑ परि॒स्रु॑तम्। स्व॒धा स्थ॑ त॒र्पय॑त मे पि॒तॄन्॥३४॥

ऊर्ज॑म्। वह॑न्तीः। अ॒मृत॑म्। घृ॒तम्। पयः॑। की॒लाल॑म्। प॒रि॒स्रुत॒मिति॑ परि॒ऽस्रुत॑म्। स्व॒धाः। स्थ॒। त॒र्पय॑त। मे॒। पि॒तॄन् ॥३४॥

Mantra without Swara
ऊर्जँवहन्तीरमृतन्घृतम्पयः कीलालम्परिस्रुतम् । स्वधा स्थ तर्पयत मे पितऋृन् ॥

ऊर्जम्। वहन्तीः। अमृतम्। घृतम्। पयः। कीलालम्। परिस्रुतमिति परिऽस्रुतम्। स्वधाः। स्थ। तर्पयत। मे। पितॄन्॥३४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘आचार्य विद्यार्थी को कैसा बनाये’ यह गत मन्त्र में वर्णित है। प्रस्तुत मन्त्र में विद्यार्थी गुरु-दक्षिणा में क्या दे—यह कहते हैं। ‘आचार्यकुल में खान-पान की कभी कमी न हो’ इस बात का ध्यान आचार्य से अध्यापित विद्यार्थियों को ही करना है। विद्यार्थी को यह ध्यान रहे कि ( ऊर्जम् ) = बल और प्राणशक्ति को तथा ( अमृतम् ) = रोग आदि से अपमृत्यु के अभावरूप अमरत्व को ( वहन्तीः ) = प्राप्त कराती हुई जो ( स्वधाः ) = स्वधाएँ अर्थात् अन्न ( स्थ ) = हैं, वे ( मे ) = मेरे ( पितृन् ) = आचार्यों को ( तर्पयत ) = सदा तृप्त करें, अर्थात् आचार्यकुल में बल, प्राणशक्ति व नीरोगता देनेवाले अन्नों की कभी कमी न हो। वे अन्न निम्न हैं—[ क ] ( घृतम् ) = घी। सामान्यतः ‘घृतम्’ का अभिप्राय गोघृत से ही होता है। यह प्राणियों के आयुष्य को बढ़ानेवाला है, इसलिए ‘घृतमायुः’ घी तो आयु ही है, यह बात प्रसिद्ध है। यह मलों का क्षरण करके बल की दीप्ति प्राप्त कराता है। [ ख ] ( पयः ) = दूध। यह हमारे सब अङ्गों का आप्यायन करनेवाला है। ताजा दूध तो ‘पीयूषम्’ अमृत ही कहा गया है। [ ग ] ( कीलालम् ) = अन्न। कील का अर्थ है बन्धन और ‘अल’ वारण = बाधक है। यह अन्न वृद्धि के प्रतिबन्धनभूत सब तत्त्वों का निवर्तक है [ सर्वबन्धनिवर्तकम्—महीधर ]। [ घ ] ( परिस्रुतम् ) = फलों के निचोड़ने से टपका हुआ रस। यह तो वस्तुतः शरीर में जीवन-रस ही सञ्चार कर देता है। इस प्रकार मुख्य स्वधा = अन्न ये चार ही हैं—‘घी, दूध, अन्न और रस’। मनुष्य को चाहिए कि इनका प्रयोग करे और अपने जीवन में ‘बल, प्राण व अमरत्व’ को धारण करनेवाला बने।
Essence
भावार्थ — गुरु-दक्षिणा यही है कि उस-उस शिक्षाणालय के विद्यार्थी आचार्यकुलों में जीवन के आधारभूत पदार्थों—‘घी, दूध, अन्न व रस’ की कमी न होने दें। यही पितृश्राद्ध भी है।
Subject
गुरु-दक्षिणा