Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 33

34 Mantra
2/33
Devata- पितरो देवताः Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृत् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आध॑त्त पितरो॒ गर्भं॑ कुमा॒रं पुष्क॑रस्रजम्। यथे॒ह पुरु॒षोऽस॑त्॥३३॥

आ। ध॒त्त॒। पि॒त॒रः॒। गर्भ॑म्। कु॒मा॒रम्। पुष्क॑रस्रज॒मिति॒ पुष्क॑रऽस्रजम्। यथा॑। इ॒ह। पुरु॑षः। अस॑त् ॥३३॥

Mantra without Swara
आधत्त पितरो गर्भङ्कुमारम्पुष्करस्रजम् । यथेह पुरुषो सत् ॥

आ। धत्त। पितरः। गर्भम्। कुमारम्। पुष्करस्रजमिति पुष्करऽस्रजम्। यथा। इह। पुरुषः। असत्॥३३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में वर्णित आचार्यों से प्रभु कहते हैं— ( पितरः ) = ज्ञान-प्रदाता आचार्यो! ( गर्भं आधत्त ) = विद्यार्थी को अपने गर्भ में धारण करो। अथर्ववेद के ब्रह्मचर्यसूक्त में यही भावना इन शब्दों में कही गई है कि ‘आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः’—आचार्य विद्यार्थी को अपने समीप लाता हुआ उसे गर्भ में धारण करता है। जैसे माता गर्भस्थ बालक की सुरक्षा करती है, उसी प्रकार आचार्य विद्यार्थी को गर्भस्थ बालक की भाँति ही संसार के अवाञ्छनीय वातावरण से बचाने का प्रयत्न करता है। 

२. इसे ( कुमारम् ) = [ कु+मारम् ] सब बुराइयों को मारनेवाला, राग-द्वेष आदि सब मलों को दूर भगानेवाला ( आधत्त ) = [ सम्पादयत ] बनाना है। 

३. ( पुष्कर-स्रजम् ) = [ पुष्कर = सूर्य, सृज् = उत्पन्न करना ] इसे अपने मस्तिष्करूप द्युलोक में ज्ञान के सूर्य को उदय करनेवाला ( आधत्त ) = बनाइए।

आचार्य ने विद्यार्थी को हृदय के दृष्टिकोण से ( कुमार ) = सब बुराइयों को मार भगानेवाला बनाना है तथा मस्तिष्क के दृष्टिकोण से ( पुष्करस्रज् ) = ज्ञान-सूर्य का उदय करनेवाला बनाना है। 

४. इसे ‘कुमार व पुष्करस्रज्’ इसलिए बनाओ ( यथा ) = जिससे यह ( इह ) =  मानव-जीवन में ( पुरुषः ) = पौरुष करनेवाला ( असत् ) = हो। ‘कु-मारता’ के अभाव में मन में विलास की वृत्तियाँ जागती हैं और मनुष्य पौरुष से बचना चाहता है तथा आराम पसन्द हो जाता है। ‘पुष्कर-स्रक्त्व’ न होने पर मनुष्य की प्रवृत्तियाँ पशुओं-जैसी हो जाती हैं और वह ‘मनुष्य’ न रहकर ‘पशु’ ही बन जाता है। पुरुष के दो मुख्य गुण हैं ‘कु-मारत्व और पुष्कर-स्रक्त्व’—हृदय का नैर्मल्य और मस्तिष्क की दीप्ति। इन दोनों गुणों को उत्पन्न करके आचार्य विद्यार्थी को दूसरा जन्म देता है और विद्यार्थी द्विज बनता है।
Essence
भावार्थ — आचार्य विद्यार्थी को गर्भ में धारण करे। उसे पवित्र हृदय व उज्ज्वल मस्तिष्क बनाने का प्रयत्न करे, जिससे वह राष्ट्र में एक उत्तम नागरिक बने।
Subject
कुमार पुष्करस्रक्