Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 29

34 Mantra
2/29
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- स्वराट् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒ग्नये॑ कव्य॒वाह॑नाय॒ स्वाहा॒ सोमा॑य पितृ॒मते॒ स्वाहा॑। अप॑हता॒ऽअसु॑रा॒ रक्षा॑सि वेदि॒षदः॑॥२९॥

अ॒ग्नये॑। क॒व्य॒वाह॑ना॒येति॑ कव्य॒ऽवाह॑नाय। स्वाहा॑। सोमा॑य। पि॒तृ॒मत॒ इति॑ पितृ॒ऽमते॑। स्वाहा॑। अप॑हता॒ इत्यप॑ऽहताः। असु॑राः। रक्षा॑सि। वे॒दि॒षदः॑। वे॒दि॒सद॑ इति॑ वेदि॒ऽषदः॑ ॥२९॥

Mantra without Swara
अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा सोमाय पितृमते स्वाहा अपहताऽअसुरा रक्षाँसि वेदिषदः ॥

अग्नये। कव्यवाहनायेति कव्यऽवाहनाय। स्वाहा। सोमाय। पितृमत इति पितृऽमते। स्वाहा। अपहता इत्यपऽहताः। असुराः। रक्षासि। वेदिषदः। वेदिसद इति वेदिऽषदः॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. राक्षसी वृत्तियों का उद्गम—प्रारम्भ कहाँ से है ? यदि इस प्रश्न पर विचार किया जाए तो हम इस परिणाम पर पहुँचेंगे कि कोई युवक व युवति जब अपने माता-पिता की सेवा में न लगकर अपना आराम देखने लगते हैं तब इस आसुरी वृत्ति का आरम्भ होता है। ‘माता-पिता को जीवन-निर्वाह की आवश्यक वस्तुएँ भी प्राप्त नहीं और ये युवक दम्पती सिनेमा जा रहे हैं’ इस रूप में इस आसुरी वृत्ति का तमाशा होने लगता है। माता-पिता मर रहे हैं, उनका औषधोपचार भी ठीक नहीं हो रहा और ये युवक-युवति फ्रूट-क्रीम का आनन्द ले रहे हैं। यह राक्षसी वृत्ति का खुला नाच होने लगता है। इनके लिए किसी भी मुख से शुभ शब्द कैसे उच्चरित हो सकते हैं? अतः मन्त्र में कहते हैं कि— 

२. ( अग्नये ) =  प्रगतिशील दम्पती के लिए ( कव्यवाहनाय ) = माता-पिता को अन्न प्राप्त करानेवाले के लिए ( स्वाहा ) = [ सु+आह ] उत्तम शब्दों का उच्चारण किया जाता है। इनके लिए माता-पिता के मुख से शुभ शब्दों का ही प्रकाश होता है, लोग भी इनकी प्रशंसा करते हैं। ( सोमाय ) = सौम्य स्वभाववाले नम्र युवक के लिए ( पितृमते ) = उत्तम माता-पितावाले के लिए—जिसके माता-पिता सुखपूर्वक हैं, उस युवक के लिए ( स्वाहा ) = शुभ शब्दों का उच्चारण होता है।

देवों के लिए दिया जानेवाला अन्न ‘हव्य’ कहलाता है और पितरों के लिए दिया जानेवाला ‘कव्य’। जो नवदम्पती अपने वृद्ध माता-पिता को खिलाकर स्वयं खाते हैं, उनकी संसार में कीर्ति होती है। जो माता-पिता के प्रति सदा नम्र होते हैं और माता-पिता को सुखमय स्थिति में रखते हैं, वे ही प्रशंसनीय होते हैं।

यह पृथिवी ‘वेदि’ है। अध्यात्म में यह शरीर वेदि है। यज्ञवेदि में आसीन होनेवाले की—यज्ञशील की ( वेदिषदः ) = इस शरीर में आ जानेवाली ( असुराः ) = आसुरी वृत्तियाँ और ( रक्षांसि ) = अपने रमण के लिए माता-पिता का भी क्षय करनेवाली वृत्तियाँ ( अपहताः ) = सुदूर नष्ट कर दी गई हैं। माता-पितारूप देवों का पूजन करनेवाला, उनके प्रति विनीत व्यवहार करनेवाला ही प्रशंसनीय होता है और उसी के जीवन में अशुभ वृत्तियों का उदय नहीं होता।
Essence
भावार्थ — हम वृद्ध माता-पिता को श्रद्धापूर्वक खिलाकर भोजन करें—यही उन्नति का मार्ग है। हम माता-पिता के प्रति विनीत हों। उनकी स्थिति को सदा उत्तम बनाने का प्रयत्न करें, तभी हम लोक में प्रशंसनीय होंगे।
Subject
पितृयज्ञ