Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 28

34 Mantra
2/28
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भूरिक् उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॑ व्रतपते व्र॒तम॑चारिषं॒ तद॑शकं॒ तन्मे॑ऽराधी॒दम॒हं यऽए॒वाऽस्मि॒ सोऽस्मि॥२८॥

अग्ने॑। व्र॒त॒प॒त॒ऽइति॑ व्रतऽपते। व्र॒तम्। अ॒चा॒रि॒ष॒म्। तत्। अ॒श॒क॒म्। तत्। मे॒। अ॒रा॒धि॒। इ॒दम्। अ॒हम्। यः। ए॒व। अस्मि॑। सः। अ॒स्मि॒ ॥२८॥

Mantra without Swara
अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषंन्तदशकंन्तन्मेराधीदमहँयऽएवास्मि सोस्मि ॥

अग्ने। व्रतपतऽइति व्रतऽपते। व्रतम्। अचारिषम्। तत्। अशकम्। तत्त्। मे। अराधि। इदम्। अहम्। यः। एव। अस्मि। सः। अस्मि॥२८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सदा सूर्य की भाँति नियमित रूप से चलने का व्रत पिछले मन्त्र में लिया गया है। ‘उसी व्रत को मैंने यथाशक्ति पाला है’ इस बात को प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि— १. ( अग्ने ) = हे अग्रणी प्रभो! ( व्रतपते ) = हमारे व्रतों के रक्षक हे प्रभो! ( व्रतम् ) = व्रत का ( अचारिषम् ) = मैंने आचरण किया है, ( तत् अशकम् ) = उस व्रत के पालन में मैं समर्थ हुआ हूँ। ( तत् मे ) = वह मेरा व्रत ( अराधि ) = सिद्ध हुआ है। प्रथम अध्याय के पाँचवे मन्त्र में मैंने निश्चय किया था कि [ चरिष्यामि ] मैं व्रत का पालन करूँगा और आपकी कृपा से [ शकेयम् ] उस व्रत का पालन कर सकूँ। आज इस द्वितीय अध्याय के अठाइसवें मन्त्र तक पहुँचकर मैं अनुभव करता हूँ कि मैंने उस व्रत का बहुत कुछ पालन किया है, उसे पूर्ण करने में आपकी कृपा से मैं बहुत कुछ समर्थ हुआ हूँ, वह मेरा व्रत सिद्ध हुआ है। 

२. और इसका परिणाम है कि ( इदम् अहम् ) = यह मैं स्त्री वा पुरुष जो भी हूँ ( यः एव अस्मि ) = जो कुछ मैं वास्तव में हूँ, ( ‘सः अस्मि’ ) = मैं वही हूँ, अर्थात् अब मैं भूल से इस पञ्चभौतिक शरीर में ‘मैं’ बुद्धि नहीं करता। इससे में ऊपर उठ गया हूँ। अब मैं आत्मा को पहचानने लगा हूँ। 

३. मन्त्र छब्बीस में ‘रश्मि’ = लगाम का उल्लेख था। यह लगाम ही ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ है। इस चित्त निरोध से मैं स्वरूप में स्थित हो गया हूँ और जो वस्तुतः हूँ, वही हो गया हूँ।
Essence
भावार्थ — हम व्रत का पालन करें और जो हैं, वही हो जाएँ। अपने आत्म-स्वरूप को पहचानें।
Subject
जो वस्तुतः हूँ, वही हूँ,—‘पूर्ण स्वस्थ’