Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 25

34 Mantra
2/25
Devata- सत्रस्य विष्णुर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृत् आर्ची पङ्क्ति,आर्ची पङ्क्ति,भूरिक् जगती, Swara- पञ्चमः , निषाद
Mantra with Swara
दि॒वि विष्णु॒र्व्यक्रꣳस्त॒ जाग॑तेन॒ च्छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽन्तरि॑क्षे॒ विष्णु॒र्व्यक्रꣳस्त॒ त्रैष्टु॑भेन॒ च्छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः। पृ॑थि॒व्यां विष्णु॒र्व्यक्रꣳस्त गाय॒त्रेण॒ च्छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽस्मादन्ना॑द॒स्यै प्र॑ति॒ष्ठाया॒ऽअग॑न्म॒ स्वः] सं ज्योति॑षाभूम॥२५॥

दि॒वि। विष्णुः॑। वि। अ॒क्र॒ꣳस्त॒। जाग॑तेन। छन्द॑सा। ततः॑। निर्भ॑क्त॒ इति॒ निःऽभ॑क्तः। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। अ॒न्तरि॑क्षे। विष्णुः॑। वि। अ॒क्र॒ꣳस्त॒। त्रैष्टु॑भेन। त्रैस्तु॑भे॒नेति॒ त्रैस्तु॑भेन। छन्द॑सा। ततः॑। निर्भ॑क्त॒ इति निःऽभ॑क्तः। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। पृ॒थि॒व्याम्। विष्णुः॑। वि। अ॒क्र॒ꣳस्त॒। गा॒य॒त्रेण॑। छन्द॑सा। ततः॑। निर्भ॑क्त॒ इति॒ निःऽभ॑क्तः। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। अ॒स्मात्। अन्ना॑त्। अ॒स्यै। प्र॒ति॒ष्ठायै॑। प्र॒ति॒स्थाया॒ इति॑ प्रति॒ऽस्थायै॑। अग॑न्म। स्व॒रिति॒ स्वः᳕। सम्। ज्योति॑षा। अ॒भू॒म॒ ॥२५॥

Mantra without Swara
दिवि विष्णुर्व्यक्रँस्त जागतेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयन्द्विष्मोन्तरिक्षे विष्णुर्व्यक्रँस्त त्रैषटुभेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयन्द्विष्मः पृथिव्याँ विष्णुर्व्यक्रँस्त गायत्रेण छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयन्द्विष्मोस्मादन्नादस्यै प्रतिष्ठायाऽअगन्म स्वः सञ्ज्योतिषाभूम ॥

दिवि। विष्णुः। वि। अक्रꣳस्त। जागतेन। छन्दसा। ततः। निर्भक्त इति निःऽभक्तः। यः। अस्मान्। द्वेष्टि। यम्। च। वयम्। द्विष्मः। अन्तरिक्षे। विष्णुः। वि। अक्रꣳस्त। त्रैष्टुभेन। त्रैस्तुभेनेति त्रैस्तुभेन। छन्दसा। ततः। निर्भक्त इति निःऽभक्तः। यः। अस्मान्। द्वेष्टि। यम्। च। वयम्। द्विष्मः। पृथिव्याम्। विष्णुः। वि। अक्रꣳस्त। गायत्रेण। छन्दसा। ततः। निर्भक्त इति निःऽभक्तः। यः। अस्मान्। द्वेष्टि। यम्। च। वयम्। द्विष्मः। अस्मात्। अन्नात्। अस्यै। प्रतिष्ठायै। प्रतिस्थाया इति प्रतिऽस्थायै। अगन्म। स्वरिति स्वः। सम्। ज्योतिषा। अभूम॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार जो जीव अपनी न्यूनताओं का शोधन करता हुआ ‘शरीर, मन व मस्तिष्क’ की उन्नति को सिद्ध करता है, वह ‘विष्णु’—व्यापक उन्नतिवाला कहलाता है। यह ( विष्णुः ) = उन्नतिशील पुरुष ( दिवि ) = [ मूर्ध्नो द्यौः ] मस्तिष्क के विषय में ( व्यक्रंस्त ) = विशेष पग रखता है, मस्तिष्क को ज्ञान-ज्योति से उज्ज्वल बनाने का प्रयत्न करता है। ( जागतेन छन्दसा ) =  जगती के हित की इच्छा से—अधिक-से-अधिक लोकहित की इच्छा से कर्म करता है। ( ततः ) =  इससे, इस ज्ञान की दीप्ति से, ( यः ) = जो कोई ( अस्मान् ) = हम सबसे द्वेष करता है ( च ) = और ( यम् ) = जिसको ( वयम् ) = हम सब ( द्विष्मः ) = अप्रीतिकर समझते हैं, वह व्यक्ति ( निर्भक्तः ) = दूर भगा दिया जाता है [ is put to flight ]। इस ज्ञान के कारण ऐसे पुरुष से हम इस प्रकार वर्त्तते हैं कि वह द्वेष करना छोड़ देता है, अथवा उसका द्वेष समाज को उतनी हानि नहीं पहुँचा पाता। 

२. ( विष्णुः ) = वह चहुँमुखी उन्नति करनेवाला पुरुष ( अन्तरिक्षे ) = हृदयान्तरिक्ष के विषय में ( व्यक्रंस्त ) =  विशेषरूप से पग रखता है। ( छन्दसा ) = इस इच्छा से कि ( त्रैष्टुभेन ) =  [ त्रि+स्तुभ् ] काम, क्रोध व लोभ तीनों को रोक सके। यह विष्णु प्रयत्न करता है कि इसके हृदय में काम, क्रोध व लोभ का प्रवेश न हो। इन्हें नरक का द्वार जानकर वह इनका अन्त करनेवाला होता है। ( ततः ) = उस राग-द्वेषातीत हृदय से ( निर्भक्तः ) = वह व्यक्ति दूर कर दिया जाता है, ( यः ) = जो ( अस्मान् ) =  हम सबसे द्वेष करता है ( च ) = और ( यम् ) = जिसको ( वयम् ) = हम सब ( द्विष्मः ) = अप्रीति के योग्य समझते हैं। पवित्र हृदयवाला मनुष्य दूसरे की अपवित्रता को दूर करने में बहुत कुछ समर्थ होता है। ‘अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः’—इस योगदर्शन के सूत्र में यही कहा है कि मेरे हृदय में अहिंसा प्रतिष्ठित होगी तो मेरे समीप दूसरा व्यक्ति भी अपने वैर को समाप्त कर देगा। 

३. अब यह ( विष्णुः ) = व्यापक उन्नतिशील पुरुष ( पृथिव्याम् ) = [ पृथिवी शरीरम् ] इस शरीर के विषय में ( व्यक्रंस्त ) = विशेषरूप से पग रखता है जिससे ( गायत्रेण छन्दसा ) = [ गयाः प्राणाः, तान् तत्रे ] प्राणशक्ति की सम्यक् रक्षा कर सके। शरीर को स्वस्थ व सबल रखना ही अन्य सब उन्नतियों का मूल है, अतः इस विषय में विशेष प्रयत्न अपेक्षित है। ( ततः ) = इसी उद्देश्य से ( निर्भक्तः ) = उस व्यक्ति को हम अलग रखते हैं, ( यः ) =  जो ( अस्मान् ) = हम सबके साथ ( द्वेष्टि ) = द्वेष करता है ( च ) = और परिणामतः ( यम् ) = जिसको ( वयम् ) = हम सब ( द्विष्मः ) = अप्रीति के योग्य समझते हैं। द्वेष शरीर के स्वास्थ्य पर बड़ा घातक प्रभाव डालता है, अतः इससे बचना आवश्यक है। 

४. ‘समाज-द्वेषी से कैसे वर्त्ता जाए’—इसका उत्तर यहाँ इस प्रकार दिया गया है कि यह ( अस्मात् अन्नात् ) = इस अन्न से ( निर्भक्तः ) = अलग किया जाए। समाज में कभी-कभी मिलकर जो प्रीतिभोज [ feasts ] चलते हैं, उनमें इसे आमन्त्रित न किया जाए। आजकल की भाषा में उसका ‘हुक्का-पानी’ बन्द कर दिया जाए। उसका यह सामाजिक बहिष्कार उसके जीवन के सुधार के लिए एक सत्याग्रह के समान है। इसका उसपर कोई प्रभाव न पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। ( अस्यै प्रतिष्ठायाः ) = उसे प्रतिष्ठा के पदों से अलग कर दिया जाए। समाज के सङ्गठनों में उसे प्रमुख स्थान न दिये जाएँ। इस प्रकार उसपर सामाजिक दबाव डालकर उसकी वृत्ति को सुधारने का यत्न किया जाए। 

५. उल्लिखित प्रकार से जीवन बिताने पर हम ( स्वः ) = स्वर्ग को ( अगन्म ) = प्राप्त होंगे और ( ज्योतिषा सम् अभूम ) = सदा अपनी ज्ञान-ज्योति के साथ होनेवाले होंगे, अर्थात् हमारा जीवन प्रकाशमय होगा, यह शुक्ल-मार्ग से चलता रहेगा।
Essence
भावार्थ — हम ‘मस्तिष्क, मन व शरीर’ की त्रिविध उन्नति करके ‘विष्णु’ कहलाएँ तथा द्वेष से दूर रहकर अपने जीवन को सुखी व प्रकाशमय बनाएँ।
Subject
तीन पग