Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 23

34 Mantra
2/23
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृत् बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
कस्त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒ स त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒ कस्मै॑ त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒ तस्मै॑ त्वा॒ विमु॑ञ्चति॒। पोषा॑य॒ रक्ष॑सां भा॒गोऽसि॥२३॥

कः। त्वा॒। वि। मु॒ञ्च॒ति॒। सः। त्वा॒। वि। मु॒ञ्च॒ति॒। कस्मै॑। त्वा॒। वि। मु॒ञ्च॒ति॒। तस्मै॑। त्वा॒। वि। मु॒ञ्च॒ति॒। पोषा॑य। रक्ष॑साम्। भा॒गः। अ॒सि॒ ॥२३॥

Mantra without Swara
कस्त्वा विमुञ्चति स त्वा विमुञ्चति कस्मै त्वावि मुञ्चति तस्मै त्वा विमुञ्चति । पोषाय रक्षसाम्भागो सि ॥

कः। त्वा। वि। मुञ्चति। सः। त्वा। वि। मुञ्चति। कस्मै। त्वा। वि। मुञ्चति। तस्मै। त्वा। वि। मुञ्चति। पोषाय। रक्षसाम्। भागः। असि॥२३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की समाप्ति ‘स्वाहा’—स्वार्थत्याग पर थी। इस स्वार्थ की भावना से वस्तुतः वे प्रभु ही मुक्त करते हैं। प्रभु का स्मरण करके—प्रभु से अपना सम्बन्ध जोड़कर मैं स्वार्थ से ऊपर उठता हूँ। प्रभु-स्मरण से मुझमें विश्व-बन्धुत्व की भावना उत्पन्न होती है, अतः प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं— ( कः ) = वह आनन्दमय प्रभु ( त्वा ) = तुझे ( विमुञ्चति ) = स्वार्थ की भावनाओं से छुड़ाते हैं। ( सः ) = वह प्रसिद्ध प्रभु ( त्वा ) = तुझे ( विमुञ्चति ) = स्वार्थभावना से मुक्त करते हैं। 

२. स्वार्थभावना से ऊपर उठने पर मनुष्य का ऐहिक जीवन सुखमय होता है और आमुष्मिक जीवन का कल्याण भी सिद्ध होता है। ( कस्मै ) = आनन्द की प्राप्ति [ कं = सुखम् ] के लिए वे प्रभु ( त्वा ) = तुझे ( विमुञ्चति ) = वासनाओं से मुक्त करते हैं, ( तस्मै ) = उस परत्र कल्याण के लिए वे प्रभु ( त्वा ) = तुझे ( विमुञ्चति ) = मुक्त करते हैं। 

३. इस प्रकार स्वार्थ की भावनाओं से ऊपर उठ जाने पर ( पोषाय ) = तू अपने वास्तविक पोषण में समर्थ होता है। यह स्वार्थ असुरों का मुख्य गुण है। उसे नष्ट करके तू ( रक्षसाम् ) = राक्षसी वृत्तियों का ( भागः ) = भगानेवाला [ put to flight ] ( असि ) = है, राक्षसी वृत्तियों को तू अपने से दूर कर देता है।
Essence
भावार्थ — स्वार्थ-भावना के छूटने पर ही ऐहिक और आमुष्मिक कल्याण निर्भर करता है। इस स्वार्थ के समाप्त होते ही दिव्य गुणों का पोषण होता है और राक्षसी वृत्तियाँ दूर भागती हैं।
Subject
विमोचन