Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 22

34 Mantra
2/22
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं ब॒र्हिर॑ङ्क्ता ह॒विषा॑ घृ॒तेन॒ समा॑दि॒त्यैर्वसु॑भिः॒ सम्म॒रुद्भिः। समिन्द्रो॑ वि॒श्वदे॑वेभिरङ्क्तां दि॒व्यं नभो॑ गच्छतु॒ यत् स्वाहा॑॥२२॥

सम्। ब॒र्हिः। अ॒ङ्क्ता॒म्। ह॒विषा॑। घृ॒तेन॑। सम्। आ॒दि॒त्यैः। वसु॑भि॒रिति॒ वसु॑ऽभिः। सम्। म॒रुद्भि॒रिति॑ म॒रुत्ऽभिः॑। सम्। इन्द्रः॑। वि॒श्वदे॑वेभि॒रिति॑ वि॒श्वऽदे॑वेभिः। अ॒ङ्क्ता॒म्। दि॒व्यम्। नभः॑। ग॒च्छ॒तु॒। यत्। स्वाहा॑ ॥२२॥

Mantra without Swara
सम्बर्हिरङ्क्ताँ हविषा घृतेन समादित्यैर्वसुभिः सम्मरुद्भिः । समिन्द्रो विश्वदेवेभिरङ्क्तान्दिव्यन्नभो गच्छतु यत्स्वाहा ॥

सम्। बर्हिः। अङ्क्ताम्। हविषा। घृतेन। सम्। आदित्यैः। वसुभिरिति वसुऽभिः। सम्। मरुद्भिरिति मरुत्ऽभिः। सम्। इन्द्रः। विश्वदेवेभिरिति विश्वऽदेवेभिः। अङ्क्ताम्। दिव्यम्। नभः। गच्छतु। यत्। स्वाहा॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. अपने जीवन में काम, क्रोध, लोभादि वासनाओं का उद्बर्हण [ eradication ] करनेवाला व्यक्ति ‘बर्हिः’ कहलाता है। यह ( बर्हिः ) = अपने जीवन को निर्व्यसन करनेवाला वीर पुरुष ( हविषा ) = हवि के द्वारा—दानपूर्वक अदन के द्वारा [ हु = दान, अदन ] अर्थात् त्याग के द्वारा और ( घृतेन ) = मलों के क्षरण व ज्ञान-दीप्ति से ( सं अंक्ताम् ) = अपने को सम्यक्तया अलंकृत करे। जीवन के सच्चे आभूषण ‘त्याग, निर्मलता व ज्ञान-दीप्ति’ ही हैं। 

२. ( आदित्यैः, वसुभिः, मरुद्भिः सं अंक्ताम् ) = आदित्यों, वसुओं व मरुतों के साथ सम्पर्क में आकर यह अपने जीवन को सुशोभित करे। सङ्ग का प्रभाव सर्वमान्य है। जैसों का साथ होता है, वैसा ही मनुष्य बन जाता है। ज्ञान का निरन्तर आदान करनेवाले आदित्यों का सम्पर्क हमें ज्ञान की रुचिवाला बनाएगा। स्वास्थ्य के नियमों का पालन करनेवाले और जीवन में उत्तम निवासवाले वसुओं का सम्पर्क हमें स्वास्थ्य का ध्यान करनेवाला बनाएगा। ‘मरुतः प्राणाः’ = प्राणों की साधना करनेवाले अथवा ‘मितराविणः’ कम बोलनेवाले मरुतों का सम्पर्क हमें भी प्राणसाधक व मितभाषी बनाएगा। 

३. ( इन्द्रः ) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीव अर्थात् जितेन्द्रिय पुरुष इस इन्द्रियजय के द्वारा ( विश्वदेवेभिः ) = सब दिव्य गुणों से ( सं अंक्ताम् ) = अपने जीवन को सुशोभित करे। ‘जितेन्द्रियता’ साधन है और ‘दिव्य गुण-लाभ’ उसका साध्य। 

४. इस प्रकार पुरुष ( दिव्यं नभः ) = स्वर्गलोक के आधारभूत आकाश को ( गच्छतु ) = प्राप्त हो। ‘दिवो नाकस्य पृष्ठात्’ इस मन्त्रांश में द्युलोक स्वर्ग का पृष्ठ है। जब मनुष्य सब दिव्य गुणों से अलंकृत होता है—सब देवों का निवास-स्थान बनता है तब उसका अगला जन्म इस मर्त्यलोक में न होकर स्वर्गलोक में होता है। बस, शर्त यह है कि ( यत् ) = यदि ( स्वाहा ) = [ स्व+हा ] उसके जीवन में स्वार्थ-त्याग हो। ‘स्व’ का—स्वार्थ का छोड़ना दिव्यता प्राप्ति का प्रमुख कारण है। देव का मौलिक गुण ही ‘देवो दानात्’ दान करना, देना, स्वार्थ को छोड़ना है।
Essence
भावार्थ — हम अपने जीवनों को दानपूर्वक अदन, निर्मलता, ज्ञान-दीप्ति, सत्सङ्ग-रुचि व दिव्य गुणों से अलंकृत करके अपने को स्वर्ग-प्राप्ति का अधिकारी बनाएँ।
Subject
जीवन का अलङ्करण