Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 19

34 Mantra
2/19
Devata- अग्निवायू देवते Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
घृ॒ताची॑ स्थो॒ धुर्यौ॑ पातꣳ सु॒म्ने स्थः॑ सु॒म्ने मा॑ धत्तम्। य॒ज्ञ नम॑श्च त॒ऽउप॑ च य॒ज्ञस्य॑ शि॒वे सन्ति॑ष्ठस्व॒ स्विष्टे॒ मे॒ संति॑ष्ठस्व॥१९॥

घृ॒ताची॑। स्थः॒। धुर्य्यौ॑। पा॒त॒म्। सु॒म्ने। स्थः॒। सु॒म्ने। मा॒। ध॒त्त॒म्। यज्ञ॑। नमः॑। च॒। ते॒। उप॑। च॒। य॒ज्ञस्य॑। शिवे॑। सम्। ति॒ष्ठ॒स्व॒। स्विष्टे॒ इति॑ सुऽइ॑ष्टे। मे॒। सम्। ति॒ष्ठ॒स्व॒ ॥१९॥

Mantra without Swara
घृताची स्थो धुर्या पातँ सुम्ने स्थः सुम्ने मा धत्तम् । यज्ञ नमश्च तऽउप च यज्ञस्य शिवे सन्तिष्ठस्व स्विष्टे मे सन्तिष्ठस्व ॥

घृताची। स्थः। धुर्य्यौ। पातम्। सुम्ने। स्थः। सुम्ने। मा। धत्तम्। यज्ञ। नमः। च। ते। उप। च। यज्ञस्य। शिवे। सम्। तिष्ठस्व। स्विष्टे इति सुऽइष्टे। मे। सम्। तिष्ठस्व॥१९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
घृताची शब्द नपुंसकलिङ्ग का द्विवचन है। जहाँ पति-पत्नी दोनों के लिए कुछ कहना होता है, वहाँ नपुंसकलिङ्ग के व्यवहार की शैली है। प्रभु पति-पत्नी से कहते हैं— १. ( घृताची स्थः ) = तुम दोनों मलों के क्षरण से क्रिया के सञ्चालक हो [ घृ = दीप्ति, अञ्चू पूजन ]। 

२. ( धुर्यौ ) = गृहस्थ की गाड़ी को उत्तमता से खींचनेवाले हो। 

३. ( सुम्ने ) = [ सुम्न = A sacrifice ] यज्ञशील बनकर ( पात ) = अपनी रक्षा करो। यज्ञ मनुष्य को विलास और परिणामतः विनाश से बचाता है। 

४. तुम दोनों सदा ( सुम्ने ) = [ A hymn, Joy ] स्तुति तथा आनन्द में ( स्थः ) = स्थित होते हो। प्रभु-स्तवन में तुम्हें आनन्द का अनुभव होता है। 

५. ( मा ) = मुझे ( धत्तम् ) = अपने में धारण करो। प्रभु को धारण करना ही मानव-जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। ( यज्ञः नमः च ) = यज्ञ और नमन ( ते ) = तेरे ( उप ) = सदा समीप हों। तू यज्ञ करे और नम्रतापूर्वक उन यज्ञों को प्रभु-चरणों में अर्पित करनेवाला बन। यही तो ‘कुरु कर्म त्यजेति च’ है—करना और छोड़ना। करना तो सही, परन्तु उन कर्मों का अहंकार न करना। ( च ) = और तू ( यज्ञस्य ) = यज्ञ के ( शिवे ) = कल्याणकर मार्ग में ( सन्तिष्ठस्व ) = सम्यक्तया स्थित हो, अर्थात् तू यज्ञों से कभी दूर न हो। 

७. ( स्विष्टे ) = [ सु+इष्टे ] मेरे अत्यन्त प्रिय [ इष्ट, इच्छ+क्त ] इन उत्तम यज्ञों [ इष्ट, यज्ञ्+क्त ] में स्थित होकर मे ( सन्तिष्ठस्व ) = मुझमें स्थित हो। यज्ञों के द्वारा हमें प्रभु में स्थिति प्राप्त होती है। इसी ‘ब्राह्मी स्थिति’ को प्राप्त करना जीवन-यात्रा का अन्तिम लक्ष्य है।
Essence
भावार्थ — हमारा जीवन उत्तम यज्ञों से परिपूर्ण हो। उन यज्ञों को प्रभु-चरणों में अर्पित कर हम प्रभु में स्थित होनेवाले हों।
Subject
यज्ञ और नमस्