Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 18

34 Mantra
2/18
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराट् त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒ꣳस्र॒वभा॑गा स्थे॒षा बृ॒हन्तः॑ प्रस्तरे॒ष्ठाः प॑रि॒धेया॑श्च दे॒वाः। इ॒मां वाच॑म॒भि विश्वे॑ गृ॒णन्त॑ऽआ॒सद्या॒स्मिन् ब॒र्हिषि॑ मादयध्व॒ꣳ स्वाहा॒ वाट्॥१८॥

स॒ꣳस्र॒वभा॑गाः। स्थ॒। इ॒षा। बृ॒हन्तः॑। प्र॒स्तरे॒ष्ठाः। प॒रि॒धेयाः॑। च॒। दे॒वाः। इ॒माम्। वाच॑म्। अ॒भि। विश्वे॑। गृ॒णन्तः॑। आ॒सद्य॑। अ॒स्मिन्। ब॒र्हिषि॑। मा॒द॒य॒ध्व॒म्। स्वाहा॑। वाट् ॥१८॥

Mantra without Swara
सँस्रवभागा स्थेषा बृहन्तः प्रस्तरेष्ठाः परिधेयाश्च देवाः । इमाँवाचमभि विश्वे गृणन्तऽआसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वँ स्वाहा वाट् ॥

सꣳस्रवभागाः। स्थ। इषा। बृहन्तः। प्रस्तरेष्ठाः। परिधेयाः। च। देवाः। इमाम्। वाचम्। अभि। विश्वे। गृणन्तः। आसद्य। अस्मिन्। बर्हिषि। मादयध्वम्। स्वाहा। वाट्॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में उपासक ने प्रार्थना की थी कि ‘मैं प्रभु को न भूलूँ’। इस भक्त से प्रभु कहते हैं कि ( सं-स्रव-भागाः स्थ ) = [ स्रु गतौ, भज् सेवायाम् ] उत्तम गतिवाले तथा उत्तम सेवन-पूजनवाले बनो। तुम्हारे कर्म उत्तम हों—तुम्हारा प्रभु-भजन उत्तम हो। कई बार प्रभु-भजन विकृत हो जाता है और हमें परस्पर द्वेष करनेवाला बनाता है। तुम्हारा प्रभु-पूजन तुम्हें ‘सर्वभूतहिते-रतः’ बनाये। 

२. ( इषा ) = [ इष प्रेरणे ] प्रेरणा के द्वारा ( बृहन्तः ) = तुम अपना वर्धन करनेवाले बनो। मेरी प्रेरणा को सुनो और आगे बढ़ो। 

३. ( प्रस्तरेष्ठाः ) = [ प्र स्तढ+स्थ ] प्रकृष्ट आच्छादन में तुम स्थित होओ, औरों के दोषों का उद्घोषण करते हुए तुम निन्दक न बन जाओ। इससे तुम्हारा अपना ही जीवन निकृष्ट बनेगा। ‘प्रस्तर’ का अर्थ पत्थर भी है। तब अर्थ इस प्रकार होगा कि तुम पत्थर पर स्थित होओ, अर्थात् पत्थर के समान अविचल होने की भावना को धारण करो। तुम्हें नीति-मार्ग से किसी प्रकार की स्तुति-निन्दा, सम्पत्ति का लोभ व मृत्यु का भय विचलित करनेवाला न हो। 

४. ( परिधेयाः ) = तुम परिधि में चलनेवालों में उत्तम बनो। तुम्हारा जीवन उत्तम एवं मर्यादित हो। 

५. ( च ) = और ( देवाः ) = [ दिव् क्रीडायाम् ] क्रीड़ा की भावनावाले बनो। संसार में जय-पराजय, हानि-लाभ व जीवन-मरण को क्रीड़ा के रूप में देखो। तुममें sportsman like spirit  हो। यह खिलाड़ी पुरुष की भावना तुम्हें हर्ष-शोक के द्वन्द्व से ऊपर उठा दे।

६. बस, ( इमां वाचम् ) = इस वाणी को—इस उल्लिखित वेद-सन्देश को ( विश्वे ) = तुम सब ( अभिगृणन्तः ) = सोते-जागते उच्चारण करते हुए, अर्थात् सदा स्मरण करते हुए ( अस्मिन् ) =  इस ( बर्हिषि ) = वासना-शून्य पवित्र हृदय में ( आसद्य ) = आसीन होकर ( मादयध्वम् ) = आनन्द का अनुभव करो। हम उल्लिखित वेद-सन्देश का जप तो करें ही, उस वाणी में स्थित भी हों, अर्थात् उसके अनुसार आचरण भी करें तभी हमारे हृदय वासनाशून्य बनेंगे। 

७. जब हम इस वाणी का उच्चारण करते हुए इसके अनुकूल आचरण करेंगे तब ( स्वाहा ) = [ स्व-हा ] हम अपने स्वार्थ का त्याग और ( वाट् ) = [ वहन्ति क्रियया सुखम् ] औरों के लिए सुखों का वहन करनेवाले बनेंगे। धर्म का सार यही है कि ‘परोपकारः पुण्याय’ हम परोपकारी बनें। हमारे जीवन में ‘स्वाहा’ और वाट्—स्वार्थत्याग और पर-सुख-प्रापण की वृत्ति हो।
Essence
भावार्थ — उत्तम कर्म, उत्तम उपासना, वेद की प्रेरणा के अनुसार शक्तिवर्धन, धर्म में स्थिरता, निन्दा-त्याग, मर्यादा का पालन और क्रीड़ा की भावना—यह वेद-सन्देश है। इस वाणी का जप और आचरण करके हम शुद्ध हृदय में आनन्द का अनुभव करें। हममें स्वार्थत्याग और परोपकार की भावना हो।
Subject
वेद का सन्देश