Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 16

34 Mantra
2/16
Devata- पूर्वार्द्धे द्यावापृथिवी मित्रावरुणौ च देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्ची पङ्क्ति,भूरिक् त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः, पञ्चम
Mantra with Swara
वसु॑भ्यस्त्वा रु॒द्रेभ्य॑स्त्वादि॒त्येभ्य॑स्त्वा॒ संजा॑नाथां द्यावापृथिवी मि॒त्रावरु॑णौ त्वा॒ वृष्ट्या॑वताम्। व्यन्तु॒ वयो॒क्तꣳ रिहा॑णा म॒रुतां॒ पृष॑तीर्गच्छ व॒शा पृश्नि॑र्भू॒त्वा दिवं॑ गच्छ॒ ततो॑ नो॒ वृष्टि॒माव॑ह। च॒क्षु॒ष्पाऽअ॑ग्नेऽसि॒ चक्षु॑र्मे पाहि॥१६॥

वसु॑भ्य॒ इति॒ वसु॑ऽभ्यः। त्वा॒। रु॒द्रेभ्यः॑। त्वा॒। आ॒दि॒त्येभ्यः॑। त्वा॒। सम्। जा॒ना॒था॒म्। द्या॒वा॒पृथि॒वी॒ऽ इति॑ द्यावाऽपृथिवी। मि॒त्रावरु॑णौ। त्वा॒। वृष्ट्या॑। अ॒व॒ता॒म्। व्यन्तु॑। वयः॑। अ॒क्तम्। रिहा॑णाः। म॒रुता॑म्। पृष॑तीः। ग॒च्छ॒। व॒शा। पृश्निः॑। भू॒त्वा। दिव॑म्। ग॒च्छ॒। ततः॑। नः। वृष्टि॑म्। आ॑। व॒ह॒। च॒क्षु॒ष्पाः। अ॒ग्ने॒। अ॒सि॒। चक्षुः॑। मे॒। पा॒हि॒ ॥१६॥

Mantra without Swara
वसुभ्यस्त्वा रुद्रेभ्यस्त्वादित्येभ्यस्त्वा सञ्जानाथान्द्यावापृथिवी मित्रावरुणौ त्वा वृष्ट्यावताम् । व्यन्तु वयोक्तँ रिहाणाः मरुताम्पृषतीर्गच्छ वशा पृश्निर्भूत्वा दिवङ्गच्छ ततो नो वृष्टिमावह । चक्षुष्पाऽअग्नेऽसि चक्षुर्मे पाहि ॥

वसुभ्य इति वसुऽभ्यः। त्वा। रुद्रेभ्यः। त्वा। आदित्येभ्यः। त्वा। सम्। जानाथाम्। द्यावापृथिवीऽ इति द्यावाऽपृथिवी। मित्रावरुणौ। त्वा। वृष्ट्या। अवताम्। व्यन्तु। वयः। अक्तम्। रिहाणाः। मरुताम्। पृषतीः। गच्छ। वशा। पृश्निः। भूत्वा। दिवम्। गच्छ। ततः। नः। वृष्टिम्। आ। वह। चक्षुष्पाः। अग्ने। असि। चक्षुः। मे। पाहि॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु के प्रतिष्ठापन का प्रकरण चल रहा है। प्रभु का प्रतिष्ठापन तो तभी होगा जब हमारे जीवनों में सभी देवों का निवास होगा, अतः पत्नी कहती है कि— ( वसुभ्यः त्वा ) = मैं आपको वसुओं के लिए सौंपती हूँ, ( रुद्रेभ्यः त्वा ) = आपको रुद्रों के लिए सौंपती हूँ और ( आदित्येभ्यः त्वा ) = मैं आपको आदित्यों के लिए सौंपती हूँ, अर्थात् मेरी इच्छा है कि आपका उठना-बैठना वसुओं, रुद्रों और आदित्यों के साथ हो। स्वास्थ्य को उत्तम बनानेवाले ‘वसु’ हैं, मानस को निर्मल बनानेवाले ‘रुद्र’ हैं तथा मस्तिष्क को उज्ज्वल बनानेवाले ‘आदित्य’ हैं। पत्नी की प्रथम कामना है कि उसके जीवन-सखा का मेल-जोल स्वस्थ, निर्मल व उज्ज्वल पुरुषों के ही साथ हो। ऐसा होने पर ही व्यक्ति में देवों का निवास हुआ करता है। 

२. ( द्यावापृथिवी ) = मस्तिष्क व शरीर ( संजानाथाम् ) = आपमें समता से निवास करनेवाले [ to live in harmony with ] हों। शरीर व मस्तिष्क दोनों स्वस्थ हों। शरीर सशक्त हो तो मस्तिष्क उज्ज्वल। 

३. ( मित्रावरुणौ ) = प्राणापान अथवा ‘मित्र’ = स्नेह की देवता और ‘वरुण’ द्वेष-निवारण की देवता ( त्वा ) = आपको ( वृष्ट्या ) = आनन्द की वर्षा से ( आवताम् ) = [ अव to give pleasure ] आनन्दित करें। आपमें स्नेह हो, किसी के प्रति द्वेष न हो और इस प्रकार आपका जीवन आनन्दमय हो।

अब पति पत्नी से कहता है— ४. ( वयः ) = [ पक्षिरूपापन्नानि गायत्र्यादीनि छन्दांसि—महीधर ] मनुष्य को ऊँची उड़ान करानेवाले—उसके जीवन को उच्च बनानेवाले गायत्री आदि छन्द ( अक्तम् ) = स्पष्टरूप से ( रिहाणाः ) = [ आस्वादयन्तः ] तुम्हें आनन्दित करते हुए ( व्यन्तु ) = प्राप्त हों, अर्थात् वेदवाणी के अध्ययन में तुम्हें अनुपम आनन्द का अनुभव हो, तुम्हारा अवकाश का सारा समय वेदाध्ययन में बीते। 

५. ( मरुताम् ) = वायुओं की ( पृषती ) = घोड़ियों को ( गच्छ ) = तुम प्राप्त होओ। ‘मरुत्’ प्राण हैं। इनकी सवारियों का अभिप्राय इनपर आरुढ़ होना है—प्राणसाधना के द्वारा प्राणों को वश में करना है। तुम प्राणायाम करनेवाले बनो। आचार्य ने लिखा है कि यह प्राणायामरूप योगसाधन पत्नी भी अवश्य करे। 

६. ( वशा ) = प्राणसाधना के द्वारा तू ‘वशा’ चित्तवृत्तियों को वश में करनेवाली बन। ‘योग’ चित्तवृत्तिनिरोध ही है। प्रतिदिन के प्राणायाम के अभ्यास से तेरा चित्त तेरे वश में हो। 

७. ( पृश्निः ) = [ संस्पृष्टा भासं ज्योतिषाम् ] तू चित्तवृत्तिनिरोध के द्वारा सूक्ष्म बुद्धि होकर ज्ञान-दीप्तियों का स्पर्श करनेवाली बन। 

८. तू ( पृश्नि भूत्वा ) = होकर ( दिवम् गच्छ ) = प्रकाश को प्राप्त कर—दिव्यता का साधन कर और ( ततः ) = तब ( नः ) = हमारे लिए ( वृष्टिं आवह ) = आनन्द की वृष्टि लानेवाली हो। घर में पति तो खूब ज्ञान-सम्पन्न हो, परन्तु पत्नी ज्ञान-शून्य हो तो घर में आनन्द नहीं आता, अतः पति कहता है कि पत्नी भी ज्ञान-सम्पन्न व संयत जीवनवाली हो और घर को सदा प्रकाशमय रक्खे।

९. अब पति-पत्नी दोनों मिलकर प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि ( अग्ने ) = हमारी उन्नति के साधक प्रभो ! ( चक्षुष्पाः असि ) = आप हमारे ( चक्षु ) = ज्ञान के रक्षक हैं, ( चक्षुः मे पाहि ) =  आप मेरे ज्ञान की रक्षा कीजिए—मेरे दृष्टिकोण को ठीक बनाये रखिए। वस्तुतः संसार का अच्छा व बुरापन हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। हमारा दृष्टिकोण ठीक है तो संसार ठीक है, जब हमारा दृष्टिकोण दूषित होता है तो संसार भी विकृत हो जाता है। ठीक दृष्टिकोणवाले संसार में आने का उद्देश्य ‘बृहस्पति व ब्रह्मा’ बनना—विशाल हृदय व ज्ञानी बनना समझते हैं नकि मौज या भोग-विलास करना। जब हमारा दृष्टिकोण ठीक होगा तो संसार पुण्यमय बनेगा, अन्यथा पापमय।
Essence
भावार्थ — घर में पति-पत्नी दोनों ज्ञान-सम्पन्न व स्वस्थ हों। उनका दृष्टिकोण ठीक हो।
Subject
पति-पत्नी की परस्पर प्रेरणा