Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 15

34 Mantra
2/15
Devata- अग्नीषोमौ देवते Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- ब्राह्मी बृहती,निचृत् अतिजगती, Swara- मध्यमः, निषाद
Mantra with Swara
अ॒ग्नीषोम॑यो॒रुज्जि॑ति॒मनूज्जे॑षं॒ वाज॑स्य मा प्रस॒वेन॒ प्रोहा॑मि। अ॒ग्नीषोमौ॒ तमप॑नुदतां॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो वाज॑स्यैनं प्रस॒वेनापो॑हामि। इ॒न्द्रा॒ग्न्योरुज्जि॑ति॒मनूज्जे॑षं॒ वाज॑स्य मा प्रस॒वेन॒ प्रोहा॑मि। इ॒न्द्रा॒ग्नी तमप॑नुदतां॒ योऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो वाज॑स्यैनं प्रस॒वेनापो॑हामि॥१५॥

अ॒ग्नीषोम॑योः। उज्जि॑ति॒मित्युत्ऽजि॑तिम्। अनु॑। उत्। जे॒ष॒म्। वाज॑स्य। मा॒ प्र॒स॒वेनेति॑ प्रऽस॒वेन॑। प्र। ऊ॒हा॒मि॒। अ॒ग्नीषोमौ॑। तम्। अप॑। नु॒द॒ता॒म्। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। वाज॑स्य। ए॒न॒म्। प्र॒स॒वेनेति॑ प्रऽस॒वेन॑। अप॑। ऊ॒हा॒मि। इ॒न्द्रा॒ग्न्योः। उज्जि॑ति॒मित्युत्ऽजि॑तिम्। अनु॑। उत्। जे॒ष॒म्। वाज॑स्य। मा। प्र॒स॒वेनेति॑ प्रऽस॒वेन॑। प्र। ऊ॒हा॒मि॒। इ॒न्द्रा॒ग्नीऽइती॑न्द्रा॒ग्नी। तम्। अप॑। नु॒द॒ता॒म्। यः। अ॒स्मान्। द्वेष्टि॑। यम्। च॒। व॒यम्। द्वि॒ष्मः। वाज॑स्य। ए॒न॒म्। प्र॒स॒वेनेति॑ प्रऽस॒वेन॑। अप॑। ऊ॒हा॒मि॒ ॥१५॥

Mantra without Swara
अग्नीषोमयोरुज्जितिमनूज्जेषँ वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि । अग्नीषोमौ तमपनुदताँ यो ऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयन्द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि । इन्द्राग्न्योरुज्जितिमनूज्जेषँ वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि । इन्द्राग्नी तमप नुदताँ योस्मान्द्वेष्टि यञ्च वयन्द्विष्मो वाजस्यैनम्प्रसवेनापोहामि ॥

अग्नीषोमयोः। उज्जितिमित्युत्ऽजितिम्। अनु। उत्। जेषम्। वाजस्य। मा प्रसवेनेति प्रऽसवेन। प्र। ऊहामि। अग्नीषोमौ। तम्। अप। नुदताम्। यः। अस्मान्। द्वेष्टि। यम्। च। वयम्। द्विष्मः। वाजस्य। एनम्। प्रसवेनेति प्रऽसवेन। अप। ऊहामि। इन्द्राग्न्योः। उज्जितिमित्युत्ऽजितिम्। अनु। उत्। जेषम्। वाजस्य। मा। प्रसवेनेति प्रऽसवेन। प्र। ऊहामि। इन्द्राग्नीऽइतीन्द्राग्नी। तम्। अप। नुदताम्। यः। अस्मान्। द्वेष्टि। यम्। च। वयम्। द्विष्मः। वाजस्य। एनम्। प्रसवेनेति प्रऽसवेन। अप। ऊहामि॥१५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( अग्नीषोमयोः ) = अग्नि व सोमतत्त्व की ( उज्जितिम् ) = उत्कृष्ट विजय के ( अनु ) = पश्चात् मैंने ( उज्जेषम्  ) = इस प्रभु-प्रतिष्ठापनरूप विजय को पाया। अग्नितत्त्व ‘ज्ञान’ का प्रतीक है और सोम ‘सौम्यता व नम्रता’ का। जब मैंने अपने अन्दर ज्ञानाङ्गिन को प्रज्वलित किया और मेरे व्यवहार में सौम्यता व नम्रता ने स्थान लिया तभी मैं जहाँ अपने जीवन को रसमय बना पाया, वहाँ अपने हृदय-मन्दिर में प्रभु का प्रतिष्ठापन करनेवाला बना। ‘अनु’ पद का महत्त्व स्पष्ट है—‘पश्चात्’। इस विद्या और विनय [ अग्नि व सोम ] की विजय के पश्चात् ही प्रभु-प्रतिष्ठापनरूप महान् विजय हुआ करती है। विद्याविनीत को ही प्रभुदर्शन होता है, अतः मैं -

२. ( वाजस्य प्रसवेन ) = [ वाग्वै वाजस्य प्रसवः—तै० २।३।२।५ ] वेदवाणी के द्वारा ( मा ) = अपने को ( प्रोहामि ) = परिवर्तित [ to change, to modify ] करता हूँ—अपने जीवन को उत्कृष्ट बनाता हूँ। ‘वाज’ का अर्थ है ‘शक्ति और ज्ञान’। वेदवाणी ज्ञान को तो उत्पन्न करती ही है, यह मनुष्य की वृत्ति को सुन्दर बनाकर उसे काम-क्रोध से बचाकर शक्तिशाली भी बनाती है। इस प्रकार शक्ति और ज्ञान की उत्पादिका होने से वेदवाणी को यहाँ ‘वाजस्य प्रसव’ कहा गया है। मेरे ये ( अग्नीषोमौ ) = अग्नि और सोम—विद्या और विनय ( तम् ) = उस व्यक्ति को ( अपनुदताम् ) = दूर करें ( यः ) = जो ( अस्मान् द्वेष्टि ) = हम सबके साथ अप्रीति करता है ( च ) = और परिणामतः ( यम् ) = जिसको ( वयम् ) = हम सब ( द्विष्मः ) = अप्रीति योग्य समझते हैं। ( एनम् ) =  इस समाजहित-द्वेषी को ( वाजस्य प्रसवेन ) = ज्ञान व शक्ति की उत्पादिका इस वेदवाणी से ( अप+ऊहामि ) = मैं दूर करता हूँ [ to remove ]।

४. ( इन्द्राग्न्योः ) = इन्द्र और अग्नि की ( उज्जितिम् ) = उत्कृष्ट विजय के ( अनु ) = पीछे ( उज्जेषम् ) = मैंने प्रभु-प्रतिष्ठापनरूप महान् विजय की है। अग्नि ‘ज्ञान व प्रकाश’ का प्रतीक है तो इन्द्र ‘बल’ का [ सर्वाणि बलकर्माणि इन्द्रस्य—नि० ] बल के सब कार्य इन्द्र के द्वारा ही किये जाते हैं। इन्द्र ने ही सब असुरों का संहार किया है। शक्ति और ज्ञान की विजय हमें ब्रह्मविजय के योग्य बनाती है। मैं इस शक्ति और ज्ञान की प्राप्ति के लिए ( वाजस्य प्रसवेन ) = इस वेदवाणी से ( मा ) = अपने को ( प्रोहामि ) = उत्कृष्ट जीवनवाला बनाता हूँ। ( इन्द्राग्नी ) = ये इन्द्र और अग्नि—शक्ति और ज्ञान ( तम् ) = उसको ( अपनुदताम् ) = दूर करें ( यः ) = जो ( अस्मान् ) = हम सबके साथ ( द्वेष्टि ) = द्वेष करता है ( च ) = और ( यम् ) = जिसको ( वयम् ) = हम सब ( द्विष्मः ) = अप्रीति योग्य समझते हैं। ( एनम् ) = इस समाजद्वेषी व्यक्ति को ( वाजस्य प्रसवेन ) = वेदवाणी के द्वारा अर्थात् शक्ति और ज्ञान के उत्पादन के द्वारा ( अप ऊहामि ) = दूर करता हूँ। वस्तुतः यदि वह समाज-द्वेषी व्यक्ति इस वेदवाणी का अध्ययन करने लगता है तब उसका जीवन परिवर्तित होकर वह द्वेषी रहता ही नहीं और हम अपनी शक्ति व ज्ञान की वृद्धि कर लेने पर द्वेष की भावनाओं से ऊपर उठ जाते हैं और उस द्वेषी के साथ इस प्रकार वर्तते हैं कि वह समाज की हानि का कारण नहीं बन पाता।
Essence
भावार्थ — हम अपने जीवनों में ‘अग्नि और सोम’—विद्या और विनय का सम्पादन करें। हम ‘इन्द्र और अग्नि’—शक्ति व ज्ञान का—क्षत्र व ब्रह्म का विकास करनेवाले बनें जिससे, ब्रह्म का विजय कर सकें, अर्थात् अपने हृदयों में ब्रह्म का प्रतिष्ठापन करनेवाले बनें।
Subject
प्रभु का प्रतिष्ठापन कैसे हुआ ?