Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 12

34 Mantra
2/12
Devata- सविता देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भूरिक् बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ए॒तं ते॑ देव सवितर्य॒ज्ञं प्राहु॒र्बृह॒स्पत॑ये ब्र॒ह्मणे॑। तेन॑ य॒ज्ञम॑व॒ तेन॑ य॒ज्ञप॑तिं॒ तेन॒ माम॑व॥१२॥

ए॒तम्। ते॒। दे॒व॒। स॒वि॒तः॒। य॒ज्ञम्। प्र। आ॒हुः॒। बृह॒स्पत॑ये। ब्र॒ह्मणे॑। तेन॑। य॒ज्ञम्। अ॒व॒। तेन॑। य॒ज्ञप॑ति॒मिति॑ य॒ज्ञऽप॑तिम्। तेन॑। माम्। अ॒व॒ ॥१२॥

Mantra without Swara
एतन्ते देव सवितर्यज्ञम्प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे । तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव ॥

एतम्। ते। देव। सवितः। यज्ञम्। प्र। आहुः। बृहस्पतये। ब्रह्मणे। तेन। यज्ञम्। अव। तेन। यज्ञपतिमिति यज्ञऽपतिम्। तेन। माम्। अव॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे ( सवितः ) = सारे ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करनेवाले—सृष्टि-यज्ञ के प्रवर्तक! ( देव ) = सब साधनों को देनेवाले, ज्ञान की ज्योति से दीप्त तथा उपासकों को ज्ञान-ज्योति से द्योतित करनेवाले [ देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा द्योतनाद्वा ] प्रभो! ( ते ) = आपके ( एतम् यज्ञम् ) = इस सृष्टि-यज्ञ को ( बृहस्पतये ) = [ बृहतः पतिः ] विशाल हृदय के पति के लिए और ( ब्रह्मणे ) = उत्कृष्ट सात्त्विक गतिवालों में भी सर्वप्रथम ब्रह्मा के लिए ( प्राहुः ) = कहते हैं, अर्थात् आपने इस सृष्टिरूप यज्ञ का प्रवर्तन इसलिए किया है कि [ क ] इसमें जीव उन्नति करते-करते अपने हृदय को अत्यन्त विशाल बनाये। असुर स्वार्थी हैं, देव दानवृत्तिवाले हैं। उन देवों का यह बृहस्पति पुरो-हित है, उवकमस है, आदर्श है। हमें इस सृष्टि में बृहस्पति बनना है। यह अपनी ही रक्षा में नहीं लगा रहता, यह इन बड़े-बड़े सभी लोकों का पालन करनेवाला होता है। 

२. इस सृष्टि-यज्ञ का दूसरा उद्देश्य यह है कि जीव ब्रह्मा बन सके। तमोगुण से ऊपर उठकर रजोगुण में, रजोगुण से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में और सत्त्वगुण में भी यह आगे बढ़कर उत्कृष्ट सात्त्विक जीवनवाला बने। इनमें भी सर्वप्रथम स्थान में ‘ब्रह्मा’ बने।

हे प्रभो! आप ( तेन ) = इसी उद्देश्य से कि मैं बृहस्पति व ब्रह्मा बन सकूँ ( यज्ञं अव ) =  मुझमें यज्ञ की भावना को सुरक्षित कीजिए। ( तेन ) = इसी उद्देश्य से ( यज्ञपतिम् ) = यज्ञ का पालन करनेवाले मेरी रक्षा कीजिए। ( तेन ) = इसी उद्देश्य से ( मां अव ) = मेरा पालन कीजिए, अर्थात् यदि मुझमें ‘बृहस्पति व ब्रह्मा’ बनने की भावना न हो तब तो मेरा यह जीवन व्यर्थ ही है, उस जीवन की रक्षा के लिए मैं क्या प्रार्थना करूँ ? हे प्रभो! मैं आपकी कृपा से आपसे किये जानेवाले इस सृष्टि-यज्ञ के उद्देश्य को समझूँ और इसमें विशाल हृदय व उत्तम सात्त्विक व्यक्ति की श्रेणी में सर्वप्रथम बनने का प्रयत्न करूँ। ‘सत्त्वस्य लक्षणं ज्ञानम्’—सत्त्व का लक्षण ज्ञान है, अतः मैं ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञानवाला ‘चतुर्वेदवेत्ता ब्रह्मा’ बन पाऊँ। मैं चारों विद्याओं का ज्ञाता होऊँ—प्रकृति विद्या और जीवविद्या [ natural and social sciences ] में निपुण बनने के साथ मैं आध्यात्मिक विद्या में [ Metaphysics ] तो निपुण बनूँ ही, इनके अतिरिक्त आयुर्वेद [ Medical science ] और युद्ध-विद्या [ Science of war ] में भी नैपुण्य प्राप्त करूँ। ऋग्वेद ‘प्रकृति-विद्या’ का वेद है, यजुर्वेद ‘जीवविद्या’ का, साम ‘अध्यात्मविद्या’ का प्रतिपादक है और अथर्व ‘आयुर्वेद व युद्धविद्या’ का उल्लेख करता है। मैं इन चारों का वेत्ता [ ब्रह्मा ] बन पाऊँ। यही तो इस जीवन की सार्थकता है।
Essence
भावार्थ — हम सृष्टि-यज्ञ के उद्देश्य को समझें और विशाल हृदय तथा ज्ञान-सम्पन्न बनने का प्रयत्न करें।
Subject
सृष्टि-यज्ञ का उद्देश्य