Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 2 / Mantra 1

34 Mantra
2/1
Devata- यज्ञो देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृत् पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
कृष्णो॑ऽस्याखरे॒ष्ठोऽग्नये॑ त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि॒ वेदि॑रसि ब॒र्हिषे॑ त्वा॒ जुष्टां॒ प्रोक्षा॑मि ब॒र्हिर॑सि स्रु॒ग्भ्यस्त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॒मि॥१॥

कृष्णः॑। अ॒सि॒। आ॒ख॒रे॒ष्ठः। आ॒ख॒रे॒स्थ इत्या॑खरे॒ऽस्थः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। जुष्ट॑म्। प्र। उ॒क्षा॒मि॒। वेदिः॑। अ॒सि॒। ब॒र्हिषे॑। त्वा॒। जुष्टा॑म्। प्र। उ॒क्षा॒मि॒। ब॒र्हिः। अ॒सि॒। स्रु॒ग्भ्य इति स्रु॒क्ऽभ्यः। त्वा॒। जुष्ट॑म्। प्र। उ॒क्षा॒मि॒ ॥१॥

Mantra without Swara
कृष्णोस्याखरेष्ठोग्नये त्वा जुष्टम्प्रोक्षामि वेदिरसि बर्हिषे त्वा जुष्टांम्प्रोक्षामि बर्हिरसि स्रुग्भ्यस्त्वा जुष्टंम्प्रोक्षामि ॥

कृष्णः। असि। आखरेष्ठः। आखरेस्थ इत्याखरेऽस्थः। अग्नये। त्वा। जुष्टम्। प्र। उक्षामि। वेदिः। असि। बर्हिषे। त्वा। जुष्टाम्। प्र। उक्षामि। बर्हिः। असि। स्रुग्भ्य इति स्रुक्ऽभ्यः। त्वा। जुष्टम्। प्र। उक्षामि॥१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( कृष्णः असि ) = तू आकर्षक जीवनवाला है। पिछले अध्याय में कहा था कि ‘तू खुली वायु और धूप’ के सेवन से पूर्ण स्वस्थ है। तेजस्वी, क्रियाशील, नीरोग, शक्तिशाली परन्तु नम्र, देवताओं का प्रिय और अविच्छिन्न अग्निहोत्री है। वस्तुतः ऐसा जीवन ही जीवन है। ऐसे जीवनवाला सबको अपनी ओर आकृष्ट करेगा ही। 

२. ( आखरेष्ठः ) = [ आ+ख+र+स्थ ] समन्तात् विद्यमान—आकाश में गति व प्राप्तिवाले प्रभु में तू स्थित है। वस्तुतः सर्वव्यापक प्रभु में स्थित होने से ही इसका जीवन सुन्दर बनता है। 

३. ( अग्नये जुष्टम् ) = अग्नि का प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाले—प्रभु का तन्मयता से उपासन करनेवाले ( त्वा ) = तुझे ( प्रोक्षामि ) = [ प्र+ उक्षामि ] आनन्द से सिक्त करता हूँ। प्रभु के उपासक का जीवन आनन्दमय होता है। प्रभु में स्थिति के विषय में गीता में कहा है—यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिँस्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते। जिसे प्राप्त करके उससे अधिक कोई लाभ प्रतीत नहीं होता और जिसमें स्थित हुआ-हुआ बड़े-से-बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता। 

४. प्रभु की प्राप्ति से इसे सब-कुछ प्राप्त हो जाता है [ सर्वं विन्दति ]। सब-कुछ प्राप्त कर लेने से तू ( वेदिः ) = [ विद् लाभे ] लब्धा ( असि ) = है। 

५. इस प्रभु-प्राप्ति के लिए ही ( बर्हिषे ) = वासना-शून्य हृदय के लिए [ उद् बृह् = उखाड़ देना ] जिस हृदय में से सब वासनाएँ नष्ट कर दी गई हैं, उस हृदय को ( जुष्टाम् ) = प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाले ( त्वा ) = तुझे ( प्रोक्षामि ) = आनन्दसिक्त करता हूँ। जो व्यक्ति हृदय को पवित्र बनाने में लगा है, वह उस हृदय में प्रभु के प्रकाश को देखने से एक अवर्णनीय आनन्द का अनुभव करता है। 

६. निरन्तर पवित्रता के प्रयत्न में लगा हुआ तू ( बर्हिः ) = वासना-शून्य हृदयवाला ( असि ) = बना है और अब जैसे चम्मच से अग्नि में घृत अर्पित किया जाता है, उसी प्रकार तू प्रजाओं में अपनी वाणी से ज्ञान का स्रवण करनेवाला बना है। इन ( स्रुग्भ्यः ) = ज्ञान प्रस्रवण की क्रियाओं में ( जुष्टम् ) = प्रीतिपूर्वक लगे हुए ( त्वा ) = तुझे ( प्रोक्षामि ) = मैं आनन्दसिक्त करता हूँ।
Essence
भावार्थ — हमारा जीवन तीन बातों में व्यतीत हो—हमारे मुख्य ध्येय ये तीन हों — १. अग्नये—प्रकाशमय अग्निनामक प्रभु की उपासना,  

२. हृदय में से वासनाओं को उखाड़ फेंकना [ बर्हिषि ] और— 

३. ज्ञान का प्रसार करना—प्रजारूप अग्नि में ज्ञानरूप घृत का प्रस्रवण करनेवाले चम्मच बनना। ये तीन बातें हमारे जीवन को आनन्द से सिक्त करनेवाली होंगी।
Subject
अग्नि-बर्हि-स्रुक्