Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 95

95 Mantra
19/95
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तेजः॑ पशू॒ना ह॒विरि॑न्द्रि॒याव॑त् परि॒स्रुता॒ पय॑सा सार॒घं मधु॑। अ॒श्विभ्यां॑ दु॒ग्धं भि॒षजा॒ सर॑स्वत्या सुतासु॒ताभ्या॑म॒मृतः॒ सोम॒ऽइन्दुः॑॥९५॥

तेजः॑। प॒शू॒नाम्। ह॒विः। इ॒न्द्रि॒याव॑त्। इ॒न्द्रि॒यव॒दिती॑न्द्रि॒यऽव॑त्। प॒रि॒स्रुतेति॑ प॒रि॒ऽस्रुता॑। पय॑सा। सा॒र॒घम्। मधु॑। अ॒श्विभ्या॒मित्य॒श्विऽभ्या॑म्। दु॒ग्धम्। भि॒षजा॑। सर॑स्वत्या। सु॒ता॒सु॒ताभ्या॒मिति॑ सुतासु॒ताभ्या॑म्। अ॒मृतः॑। सोमः॑। इन्दुः॑ ॥९५ ॥

Mantra without Swara
तेजः पशूनाँ हविरिन्द्रियावत्परिस्रुता पयसा सारघं मधु । अश्विभ्यान्दुग्धम्भिषजा सरस्वत्या सुतासुताभ्याममृतः सोम इन्दुः ॥

तेजः। पशूनाम्। हविः। इन्द्रियावत्। इन्द्रियवदितीन्द्रियऽवत्। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। पयसा। सारघम्। मधु। अश्विभ्यामित्यश्विऽभ्याम्। दुग्धम्। भिषजा। सरस्वत्या। सुतासुताभ्यामिति सुतासुताभ्याम्। अमृतः। सोमः। इन्दुः॥९५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (पशूनाम्) = पशुओं के (तेज:) = तेजस्विता के कारणभूत दूध को मैं ग्रहण करूँ। वेद में अन्यन्त्र ‘पयः पशूनाम्' ही पाठ है, अतः यहाँ (तेजः) = व (पयः) = में कार्यकारणभाव होने से पयः के स्थान में तेजः का प्रयोग किया गया है। २. (हविः) = दानपूर्वक किया हुआ सात्त्विक भोजन, यज्ञशेषरूप पथ्य, (इन्द्रियावत्) = हमारे बल को (इन्द्रियं वीर्यम्) बढ़ानेवाला हो । ३. मैं (परिस्स्रुता) = परिपक्व अन्न के साथ तथा (पयसा) = दूध के साथ (सारघं मधु) = मैं मधुमक्षिकाओं से निर्मित शहद का ग्रहण करूँ। ४. (अश्विभ्याम्) = प्राणापान की शक्ति के लिए (दुग्धम्) = मैं अमृत दुग्ध (दूध) को स्वीकार करूँ। ५. इस प्राणापानरूप (भिषजा) = वैद्यों से (अमृत:) = मैं बनूँ, कभी रोगों का शिकार न होऊँ। ६. (सरस्वत्या) = ज्ञान की अधिदेवता से, अर्थात् अत्युत्तम ज्ञान से मैं (सोमः) = सौम्य बनूँ । ज्ञान का परिणाम तो है ही 'विनय'। यदि मैं विनीत न रहकर अभिमानी हो जाऊँगा तो मेरा सारा उत्थान समाप्त हो जाएगा। ७. (सुतासुताभ्याम्) = सुत व असुतों के द्वारा बड़े परिश्रम से भूमि में पैदा किये गये उत्तम सात्त्विक अन्नों के द्वारा [परिसुता] तथा असुत, अर्थात् गौ आदि के दूध के द्वारा यह (इन्दु:) = ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाला बनता है अथवा शक्तिशाली बनता है।
Essence
भावार्थ- पशुओं का दूध, यज्ञशेष अन्न व शहद के प्रयोग से मैं अमर-नीरोग बनूँ । बुद्धि की तीव्रता से ज्ञानी बनकर [विनीत बनूँ] । ठीक अन्नों का प्रयोग मुझे शक्तिशाली बनाये। यह ‘अमृत- सोम- इन्दु' ही राजा बनने के योग्य हैं। इस राजा के वर्णन से ही अगले अध्याय का प्रारम्भ होता है।
Subject
अमृत- सोम- इन्दु