Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 88

95 Mantra
19/88
Devata- सरस्वती देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- स्वराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मुख॒ꣳ सद॑स्य॒ शिर॒ऽइत् सते॑न जि॒ह्वा प॒वित्र॑म॒श्विना॒सन्त्सर॑स्वती। चप्यं॒ न पा॒युर्भि॒षग॑स्य॒ वालो॑ व॒स्तिर्न शेपो॒ हर॑सा तर॒स्वी॥८८॥

मुख॑म्। सत्। अ॒स्य॒। शिरः॑। इत्। सते॑न। जि॒ह्वा। प॒वित्र॑म्। अ॒श्विना॑। आ॒सन्। सर॑स्वती। चप्य॑म्। न। पा॒युः। भि॒षक्। अ॒स्य॒। वालः॑। व॒स्तिः। न। शेपः॑। हर॑सा। त॒र॒स्वी ॥८८ ॥

Mantra without Swara
मुखँ सदस्य शिरऽइत्सतेन जिह्वा पवित्रमश्विनासन्त्सरस्वती । चप्यन्न पायुर्भिषगस्य वालो वस्तिर्न शेपो हरसा तरस्वी ॥

मुखम्। सत्। अस्य। शिरः। इत्। सतेन। जिह्वा। पवित्रम्। अश्विना। आसन्। सरस्वती। चप्यम्। न। पायुः। भिषक्। अस्य। वालः। वस्तिः। न। शेपः। हरसा। तरस्वी॥८८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अस्य) = इस - गतमन्त्र के 'कुम्भ' का (मुखम्) = मुख (सत्) = उत्कृष्ट होता है। [सत् इति उत्तरनाम - नि० ३।२९ ] । २. (सतेन) = इस उत्कृष्ट मुख के साथ (इत्) = निश्चय से (शिरः) = मस्तिष्क होता है। जहाँ इसका मुख उत्कृष्ट होता है, वहाँ इसका मस्तिष्क भी ठीक होता है । ३. (जिह्वा पवित्रम्) = इसकी जिह्वा पवित्र होती है। (अश्विना पवित्रम्) = इसके प्राणापान इसे पवित्र बनानेवाले होते हैं । ४. 'मुख व मस्तिष्क की उत्कृष्टता' तथा 'जिह्वा व प्राणापान की पवित्रता' के कारण ही (आसन्) [आस्ये] = इसके मुख में सरस्वती विद्या की अधिदेवता का निवास होता है। ५. इस विद्या के कारण सब वस्तुओं का ठीक प्रयोग करने से (पायुः) = इसकी मलशोधक गुदा-इन्द्रिय (चप्पम्) = [चप सान्त्वने] इसको सान्त्वना व शान्ति प्राप्त करानेवाली है। मलशोधन ठीक हो जाने से शरीर व मन में शान्ति व प्रसन्नता का अनुभव होता है। ६. (अस्य) = इसके (बालः) - भिन्न-भिन्न शरीर - अङ्गों में उत्पन्न बाल (भिषक्) = इसके वैद्य होते हैं। ये उसे सर्दी-गर्मी से बचाने में सहायक होते हैं। मलों के चूसने में उपयुक्त होते हैं और इस प्रकार से रोगनिवारण करते हुए इसके वैद्य ही होते हैं। ७. (वस्तिः न शेप:) = मूत्रस्थान और मूत्रेन्द्रिय तो (हरसा) = मलहरण के द्वारा (तरस्वी) = इसको बलसम्पन्न बनानेवाले होते हैं।
Essence
भावार्थ- 'कुम्भ' अर्थात् अपने अन्दर शक्ति व आनन्द का पूरण करनेवाले के सब अङ्ग सुन्दर होते हैं। मुख और सिर तो उत्कृष्ट होते ही हैं, इसकी जिह्वा व इसके प्राणापान पवित्र होते हैं। इसके मुख में सरस्वती का निवास होता है। इसकी मलशोधक इन्द्रियाँ भी मलशोधन के द्वारा इसे बलवान् बनाती हैं।
Subject
अङ्ग-प्रत्यङ्ग का स्वरूप