Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 86

95 Mantra
19/86
Devata- सविता देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒न्त्राणि॑ स्था॒लीर्मधु॒ पिन्व॑माना॒ गुदाः॒ पात्रा॑णि सु॒दुघा॒ न धे॒नुः। श्ये॒नस्य॒ पत्रं॒ न प्ली॒हा शची॑भिरास॒न्दी नाभि॑रु॒दरं॒ न मा॒ता॥८६॥

आ॒न्त्राणि॑। स्था॒लीः। मधु॑। पिन्व॑मानाः। गुदाः॑। पात्रा॑णि। सु॒दुघेति॑ सु॒ऽदुघा॑। न। धे॒नुः। श्ये॒नस्य॑। पत्र॑म्। न। प्ली॒हा। शची॑भिः। आ॒स॒न्दीत्या॑ऽस॒न्दी। नाभिः॑। उ॒दर॑म्। न। मा॒ता ॥८६ ॥

Mantra without Swara
आन्त्राणि स्थालीर्मधु पिन्वमाना गुदाः पात्राणि सुदुघा न धेनुः । श्येनस्य पत्रन्न प्लीहा शचीभिरासन्दी नाभिरुदरन्न माता ॥

आन्त्राणि। स्थालीः। मधु। पिन्वमानाः। गुदाः। पात्राणि। सुदुघेति सुऽदुघा। न। धेनुः। श्येनस्य। पत्रम्। न। प्लीहा। शचीभिः। आसन्दीत्याऽसन्दी। नाभिः। उदरम्। न। माता॥८६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के 'सुत्रामा इन्द्र' की (मधु) = मधुरगुणान्वित अन्न को (पिन्वमानाः) = सेवन करती हुई (अन्त्राणि) = [ अन्नपाकाधारा नाड़ी :- द० ] अन्न का परिपाक करनेवाली नाड़ियाँ (स्थाली:) = [यासु पच्यन्ते अन्नानि] उखा [पतीली] होती हैं। जैसे पतीली में अन्न का परिपाक करते हैं, इसी प्रकार इन नाड़ियों में अन्नपाचन क्रिया चलती है। २. (गुदाः) = मल को दूर करनेवाली इन्द्रियाँ ही (पात्राणि) - [ पा रक्षणे] रक्षिका होती हैं। इन इन्द्रियों के ठीक कार्य करने पर ही शरीर का रक्षण निर्भर है। ३. (न) और (धेनुः) = [गौर्नाडी धमनिः धेनुरित्यर्थान्तरम्] नाड़ियाँ व धमनियाँ (सुदुघा) = [दुह प्रपूरणे] उत्तमत्ता से प्रपूरण करनेवाली हैं। शरीर में उस उस स्थान पर आवश्यक रुधिर को पहुँचानेवाली होती हैं। ४. (न) = और (प्लीहा) - तिल्ली (श्येनस्य पत्रम्) = बाज़ के पंख के समान है। प्लीहा का आकार श्येन पंख - सा है। जैसे पंख श्येन की उड़ान का कारण होता है, उसी प्रकार प्लीहा अविकृत होने पर मनुष्य के उत्साह का कारण बनती है, विकृत होकर मनुष्य को उदासीन कर देती है। ५. (शचीभिः) = सब प्रज्ञाओं व कर्मों का अधिष्ठान होने से (नाभिः) = नाभि (आसन्दी) = राजपीठ के समान है, इसी नाभि में सब प्रज्ञान व कर्म सम्बद्ध हैं । ६. (न) = और (उदरम्) = उदर तो (माता) = सम्पूर्ण रुधिर आदि का निर्माण करनेवाला है ही।
Essence
भावार्थ - [क] जिस समय हमारी आँतें अन्न का ठीक परिपाक करेंगी, [ख] गुदा आदि इन्द्रियाँ मल के दूरीकरण से रक्षिका होंगी, [ग] धमनियाँ रुधिरादि का ठीक पूरण करेंगी [घ] प्लीहा अविकृत होकर हमारे उत्थान का कारण बनेगा, [ङ] नाभि सब शक्तियों व प्रज्ञानों का आधार बनेगी और [च] उदर रुधिरादि का निर्माण करेगा, तभी हम पूर्ण स्वस्थ बनेंगे।
Subject
अङ्ग-प्रत्यङ्ग