Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 83

95 Mantra
19/83
Devata- सरस्वती देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सर॑स्वती॒ मन॑सा पेश॒लं वसु॒ नास॑त्याभ्यां वयति दर्श॒तं वपुः॑। रसं॑ परि॒स्रुता॒ न रोहि॑तं न॒ग्नहु॒र्धीर॒स्तस॑रं॒ न वेम॑॥८३॥

सर॑स्वती। मन॑सा। पे॒श॒लम्। वसु॑। नास॑त्याभ्याम्। व॒य॒ति॒। द॒र्श॒तम्। वपुः॑। रस॑म्। प॒रि॒स्रुतेति॑ परि॒ऽस्रुता॑। न। रोहि॑तम्। न॒ग्नहुः॑। धीरः॑। तस॑रम्। न। वेम॑ ॥८३ ॥

Mantra without Swara
सरस्वती मनसा पेशलँवसु नासत्याभ्यां वयति दर्शतँवपुः । रसम्परिस्रुता न रोहितन्नग्नहुर्धीरस्तसरन्न वेम ॥

सरस्वती। मनसा। पेशलम्। वसु। नासत्याभ्याम्। वयति। दर्शतम्। वपुः। रसम्। परिस्रुतेति परिऽस्रुता। न। रोहितम्। नग्नहुः। धीरः। तसरम्। न। वेम॥८३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सरस्वती) = ज्ञान की अधिदेवता (मनसा) = मनन-संकल्प से तथा (नासत्याभ्याम्) = प्राणापानों के द्वारा (पेशलम्) = लचकीले, कोमल [Soft], सूखे काठ की भाँति न अकड़े हुए, (वसु) = निवास के योग्य, (दर्शनम्) = दर्शनीय, सुन्दर (वपुः) = शरीर को वयति सन्तत करती है, बनाती है, अर्थात् 'ज्ञान, संकल्प तथा प्राणापान' शरीर को लचकीला, उत्तम व सुन्दर बनाते हैं। ज्ञान से ही हमारा आहार-विहार हितकर होगा और शरीर नीरोग रहेगा। विचारशीलता व संकल्प उत्साह को स्थिर रखते हैं और शरीर निवास के योग्य बना रहता है। प्राणापान शरीर को तेजस्वी व दर्शनीय बनाते हैं । २. (सरस्वती) = ज्ञानाधिदेवता (परिस्स्रुता) = परिपक्व अन्न से (रसम्) = रस को (वयति) = सन्तत करती है, अर्थात् ज्ञान से हम स्वास्थ्य के लिए हितकर अन्न-रसों का सेवन करनेवाले बनते हैं। यह रस (रोहितम्) = हमारी वृद्धि का कारण बनता है । ३. (न) = और (नग्नहुः) = [नग्नः अपि जुहोति ] स्वयं नग्न रहता हुआ भी जो आहुति देता है, अर्थात् लोकहित के लिए यज्ञियवृत्तिवाला होता है-खूब दान देता है और (धीरः) = धैर्यशाली होता है (तसरम्) = [तस्यति उपक्षयति दुःखानि येन - द०] सब दुःखों व रोगों का क्षय करनेवाले (वेम) = [ वी = प्रजनन] विकासवाले शरीर को वयति सन्तत करता है, अर्थात् जो व्यक्ति यज्ञियवृत्ति के कारण भोगवाद में नहीं फँस जाता [नग्नहु:] और जीवन में शान्ति से चलता है [ धीर: ] वह शरीर को नीरोग [तसरं ] तथा विकसित शक्तियोंवाला [वेम] बना पाता है।
Essence
भावार्थ - [क] हमें ज्ञानपूर्वक आहार-विहार करना चाहिए, [ख] विचारशील उत्तम संकल्पवाला होना चाहिए, [ग] प्राणापान की शक्ति का वर्धन करना चाहिए, [घ] शरीर की उन्नति के लिए पक्वान्नों के रस का ग्रहण करना चाहिए तथा [ङ] त्यागवृत्तिवाला व धैर्यशील बनकर नीरोग व विकसित शरीरवाला बनना चाहिए।
Subject
रसं ओषधीनाम्