Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 8

95 Mantra
19/8
Devata- सोमो देवता Rishi- आभूतिर्ऋषिः Chhand- निचृत पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽस्याश्वि॒नं तेजः॑ सारस्व॒तं वी॒र्यमै॒न्द्रं बल॑म्। ए॒ष ते॒ योनि॒र्मोदा॑य त्वान॒न्दाय॑ त्वा॒ मह॑से त्वा॥८॥

उ॒प॒या॒मगृ॑हीतः। अ॒सि॒। आ॒श्वि॒नम्। तेजः॑। सा॒र॒स्व॒तम्। वी॒र्य᳖म्। ऐ॒न्द्रम्। बल॑म्। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। मोदा॑य। त्वा॒। आ॒न॒न्दायेत्या॑ऽऽन॒न्दाय॑। त्वा॒। मह॑से। त्वा॒ ॥८ ॥

Mantra without Swara
उपयामगृहीतो स्याश्विनन्तेजः सारस्वतँवीर्यऐन्द्रम्बलम् । एष ते योनिर्मादाय त्वानन्दाय त्वा महसे त्वा ॥

उपयामगृहीतः। असि। आश्विनम्। तेजः। सारस्वतम्। वीर्यम्। ऐन्द्रम्। बलम्। एषः। ते। योनिः। मोदाय। त्वा। आनन्दायेत्याऽऽनन्दाय। त्वा। महसे। त्वा॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. आभूति प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे प्रभो! (उपयामगृहीतः असि) = आप उपासना के द्वारा यम-नियमों के पालन से गृहीत होते हैं। आपको वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जो उपासनारत होता है। २. उस उपासक को (आश्विनं तेजः) = प्राणापान-सम्बन्धी तेजस्विता प्राप्त होती है और यह तेजस्विता ही उसे उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घ जीवन देनेवाली बनती है। ३. उपासना से ही (सारस्वतं वीर्यम्) = ज्ञान की अधिदेवता के साथ सम्बद्ध वीर्य इसे प्राप्त होता है। उपासक को ज्ञान की वह शक्ति प्राप्त होती है जो उसके सब कर्मों को पवित्र करनेवाली होती है। ४. (ऐन्द्रं बलम्) = उपासना से ही अध्यात्म बल प्राप्त होता है। एवं यह उपासक शरीर से स्वस्थ, मस्तिष्क में ज्ञानदीप्त तथा हृदय में आत्मिक शक्तिसम्पन्न व पवित्र बनता है । ५. (एषः) = यह शरीर, बुद्धि व मन के ऐश्वर्य को प्राप्त करनेवाला 'आभूति' नामवाला मैं (ते योनिः) = हे प्रभो! आपका निवास स्थान बनता हूँ। आपको अपने हृदयदेश में बिठाता हूँ। (मोदाय त्वा) = इसलिए आपको हृदयदेश में बिठाता हूँ कि सांसारिक वस्तुओं का उचित उपयोग करते हुए 'मोद' व हर्ष का लाभ कर सकूँ, ये सांसारिक वस्तुएँ अत्युपयुक्त होकर मेरे जीवन को अस्वस्थ व कटु न बना दें। (आनन्दाय त्वा) = मैं आपको इसलिए हृदय - मन्दिर में प्रतिष्ठित करता हूँ कि प्राकृतिक भोगों से ऊपर उठकर मैं वास्तविक आनन्द का लाभ करनेवाला बनूँ। इन भोग्य पदार्थों के समुचित उपयोग ने स्वस्थ बनाकर मुझे सुखी किया था। इनमें अनासक्ति मेरे निःश्रेयस को सिद्ध करनेवाली होगी और (महसे त्वा) = आपके सम्पर्क से तेजस्वी बनने के लिए मैं आपका निवास बनने का प्रयत्न करता हूँ । आपके सम्पर्क से शक्तिसम्पन्न बनकर ही तो मैं सब शत्रुओं पर विजय पानेवाला बन पाऊँगा ।
Essence
भावार्थ- प्रभु-उपासन हमारे जीवन में 'मोद, आनन्द व महस्' को भरनेवाला होता है।
Subject
मोद-आनन्द-महस्