Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 79

95 Mantra
19/79
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दृष्ट्वा प॑रि॒स्रुतो॒ रस॑ꣳ शु॒क्रेण॑ शु॒क्रं व्य॑पिब॒त् पयः॒ सोमं॑ प्र॒जाप॑तिः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं वि॒पान॑ꣳ शु॒क्रमन्ध॑स॒ऽइन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं॒ मधु॑॥७९॥

दृ॒ष्ट्वा। प॒रि॒स्रुत॒ इति॑ परि॒स्रुतः॑। रस॑म्। शु॒क्रेण॑। शु॒क्रम्। वि। अ॒पि॒ब॒त्। पयः॑। सोम॑म्। प्र॒जाप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। ऋ॒तेन॑। स॒त्यम्। इ॒न्द्रि॒यम्। वि॒पान॒मिति॑ वि॒ऽपान॑म्। शु॒क्रम्। अन्ध॑सः। इन्द्र॑स्य। इ॒न्द्रि॒यम्। इ॒दम्। पयः॑। अ॒मृत॑म्। मधु॑ ॥७९ ॥

Mantra without Swara
दृष्ट्वा परिस्रुतो रसँ शुक्रेण शुक्रँ व्यपिबत्पयः सोमम्प्रजापतिः । ऋतेन सत्यमिन्द्रियँविपानँ शुक्रमन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदम्पयोमृतम्मधु ॥

दृष्ट्वा। परिस्रुत इति परिस्रुतः। रसम्। शुक्रेण। शुक्रम्। वि। अपिबत्। पयः। सोमम्। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। ऋतेन। सत्यम्। इन्द्रियम्। विपानमिति विऽपानम्। शुक्रम्। अन्धसः। इन्द्रस्य। इन्द्रियम्। इदम्। पयः। अमृतम्। मधु॥७९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में वेद से सत्यानृत के रूप को व विधि-निषेध को देखने का उल्लेख था। प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि (प्रजापतिः) = राजा (दृष्ट्वा) = वेद के विधि-निषेध को देखकर, उसके अनुसार (परिस्स्रुतः) = परिपक्व अन्न से (रसम्) = रस को (व्यपिबत्) = पीता है, इसी परिपक्व अन्न के रस से उत्पन्न (शुक्रम्) = वीर्य को (शुक्रेण) = [ शुच् दीप्तौ] उज्ज्वलता के हेतु से अथवा [शुक् गतौ] क्रियाशीलता के उद्देश्य से (व्यपिबत्) = अपने शरीर में पीता है, अर्थात् उसे शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करता है। २. यह शरीर में सुरक्षित सोम (पयः) = उसका आप्यायन व वर्धन करनेवाला होता है तथा (सोमम्) = उसे सौम्य व शान्त बनानेवाला होता है। ३. (ऋतेन) = यज्ञ व नियमितता के द्वारा यह सोम (सत्यम्) = उसे सत्यवृत्तिवाला बनाता है (इन्द्रियम्) = उसकी एक-एक इन्द्रिय को शक्तिसम्पन्न करता है, (विपानम्) = उसका विशेषरूप से रक्षण करता है, उसे रोगों से बचाता है। ४. (शुक्रम्) = यह उसे दीप्त करता है, उसे क्रियाशील बनाता है। ५. (अन्धसः) = अन्न से उत्पन्न हुआ यह सोम (इन्द्रस्य) = उस जितेन्द्रिय पुरुष की (इन्द्रियम्) = इन्द्रियों की शक्ति को बढ़ानेवाला होता है। (इदम्) = यह (पयः) = उसका वर्धन करता है। (अमृतम्) = उसे रोगों से मरने नहीं देता, (मधु) = उसके जीवन को मधुर बनाता है।
Essence
भावार्थ- परिपक्व अन्न के रसों से उत्पन्न वीर्य मनुष्य शरीर में सुरक्षित होकर उसका आप्यायन करनेवाला होता है और उसे शान्त बनाता है।
Subject
परिपक्व अन्न का रस