Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 75

95 Mantra
19/75
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अन्ना॑त् परि॒स्रुतो॒ रसं॒ ब्रह्म॑णा॒ व्यपिबत् क्ष॒त्रं पयः॒ सोमं॑ प्र॒जाप॑तिः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं वि॒पानंꣳ शु॒क्रमन्ध॑स॒ऽइन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं॒ मधु॑॥७५॥

अन्ना॑त्। प॒रि॒स्रुत॒ इति॑ परि॒ऽस्रुतः॑। रस॑म्। ब्रह्म॑णा। वि। अ॒पि॒ब॒त्। क्ष॒त्रम्। पयः॑। सोम॑म्। प्र॒जाप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। ऋ॒तेन॑। स॒त्यम्। इ॒न्द्रि॒यम्। वि॒पान॒मिति॑ वि॒ऽपान॑म्। शु॒क्रम्। अन्ध॑सः। इन्द्र॑स्य। इ॒न्द्रि॒यम्। इ॒दम्। पयः॑। अ॒मृत॑म्। मधु॑ ॥७५ ॥

Mantra without Swara
अन्नात्परिस्रुतो रसम्ब्रह्मणा व्यपिबत्क्षत्रम्पयः सोमम्प्रजापतिः । ऋतेन सत्यमिन्द्रियँविपानँ शुक्रमन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदम्पयोमृतम्मधु ॥

अन्नात्। परिस्रुत इति परिऽस्रुतः। रसम्। ब्रह्मणा। वि। अपिबत्। क्षत्रम्। पयः। सोमम्। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। ऋतेन। सत्यम्। इन्द्रियम्। विपानमिति विऽपानम्। शुक्रम्। अन्धसः। इन्द्रस्य। इन्द्रियम्। इदम्। पयः। अमृतम्। मधु॥७५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (परिस्स्रुतः) = [सर्वतः स्रुतः पक्वात्-द०] सब प्रकार से परिपक्व (अन्नात्) = [यवादे: - द० ] जौ आदि अन्नों से (सोमं रसम्) = उत्पन्न सारभूत इस सोमरस को - वीर्यशक्ति को (प्रजापतिः) = प्रजा का रक्षक राजा (ब्रह्मणा) = ज्ञान के द्वारा अथवा ब्रह्म के ध्यान के द्वारा (व्यपिबत्) = विशेषरूप से पान करता है। स्वाध्याय व ब्रह्मध्यान सोमरक्षण में सहायक होते हैं । २. यह शरीर में ही पिया हुआ - व्याप्त किया हुआ सोम (क्षत्रम्) = सब क्षतों व घावों से बचानेवाला होता है, अथवा यह [क्षत्रं-बल] बल का देनेवाला होता है और (पयः) = आप्यायन व वर्धन करनेवाला होता है । ३. (ऋतेन) = यज्ञ व नियमितता के द्वारा यह सोम (सत्यम् इन्द्रियं विपानम्) = सत्य का वर्धन करता हैं, इन्द्रियों की शक्ति को बढ़ाता है और विशेषरूप से रोगों से रक्षा करता है। ४. (शुक्रम्) = यह जीवन को उज्ज्वल [ शुच् दीप्तौ] व क्रियाशील [शुक् गतौ] बनाता है। ५. (अन्धसः) = सात्त्विक अन्न से उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (इन्द्रस्य) = जीवात्मा की (इन्द्रियम्) = इन्द्रिय-शक्तियों को बढ़ानेवाला होता है (इदं पयः) = यह आप्यायन करता है,(अमृतम्) = यह असमय के रोगों से मरने नहीं देता और मधु-जीवन को मधुर बनाता है।
Essence
भावार्थ- प्रजा का रक्षक राजा परिपक्व अन्नों का सेवन करता हुआ उत्पन्न सारभूत सोम का शरीर में पान करता है, तभी यह प्रजाओं को क्षतों से बचानेवाला व प्रजाओं का वर्धन करनेवाला होता है। ब्रह्मचर्येण राजा राष्ट्र विरक्षति - ब्रह्मचर्य से ही राजा राष्ट्र की उत्तम रक्षा करता है।
Subject
प्रजापति का सोमपान