Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 73

95 Mantra
19/73
Devata- आङ्गिरसो देवताः Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अद्भ्यः क्षी॒रं व्य॑पिब॒त् क्रुङ्ङा॑ङ्गिर॒सो धि॒या। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं वि॒पान॑ꣳशु॒क्रमन्ध॑स॒ऽइन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं॒ मधु॑॥७३॥

अ॒द्भ्य इत्य॒त्ऽभ्यः। क्षी॒रम्। वि। अ॒पि॒ब॒त्। क्रुङ्। आ॒ङ्गि॒र॒सः। धि॒या। ऋ॒तेन॑। स॒त्यम्। इ॒न्द्रि॒यम्। वि॒पान॒मिति॑ वि॒ऽपान॑म्। शु॒क्रम्। अन्ध॑सः। इन्द्र॑स्य। इ॒न्द्रि॒यम्। इ॒दम्। पयः॑। अमृत॑म्। मधु॑ ॥७३ ॥

Mantra without Swara
अद्भ्यः क्षीरँव्यपिबत्क्रुङ्ङाङ्गिरसो धिया । ऋतेन सत्यमिन्द्रियँविपानँ शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदम्पयोमृतम्मधु ॥

अद्भ्य इत्यत्ऽभ्यः। क्षीरम्। वि। अपिबत्। क्रुङ्। आङ्गिरसः। धिया। ऋतेन। सत्यम्। इन्द्रियम्। विपानमिति विऽपानम्। शुक्रम्। अन्धसः। इन्द्रस्य। इन्द्रियम्। इदम्। पयः। अमृतम्। मधु॥७३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (क्रुङ्) = क्रौञ्चपक्षी [ Swan ] - जैसे हंसजाति का यह क्रौञ्चपक्षी (अद्भ्यः) = जलों से (क्षीरम्) = दूध को (व्यपिबत्) = विशेषरूप से पी लेता है, उसी प्रकार (अंगिरसः) - अपने एक-एक अङ्ग को रसमय बनानेवाला विद्वान् (धिया) = ज्ञानपूर्वक किये गये कर्मों के द्वारा [धी = कर्म तथा प्रज्ञा] (अद्भ्यः क्षीरम्) = [ आपो रेतो भूत्वा] जलों से उत्पन्न सारभूत सोम को [क्षि निवासगत्योः], शरीर में उत्तम निवास व गति, अर्थात् क्रियाशीलता के कारणभूत सोम को (व्यपिबत्) = अपने अन्दर ही पीने का प्रयत्न करता है। सोमरक्षा का सरलतम साधन प्रज्ञापूर्वक कर्मों में लगे रहना ही है। अकर्मण्यता हमें गलत मार्ग की ओर ले जाती है। इस अकर्मण्यता से हममें वासनाएँ जागती हैं और सोमपान सम्भव नहीं रहता। २. (ऋतेन) = यह सोम यज्ञ व नियमितता के द्वारा (सत्यं इन्द्रियं विपानम्) = हमारे सत्य को विकसित करता हैं, इन्द्रिय-शक्तियों को बढ़ाता है और रोगों से रक्षा करता है। ३. यह (शुक्रम्) = हमारे जीवन को उज्ज्वल बनाता है। ४. (अन्धसः) = अन्न से उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (इन्द्रस्य) = सब अङ्गों की शक्ति का वर्धक होता है। ५. (इदम्) = यह शुक्र [सोम] उसका (पयः) = आप्यायन करनेवाला (अमृतम्) = उसे अकाल में न मरने देनेवाला तथा मधु उसके जीवन को मधुर बनानेवाला है।
Essence
भावार्थ- हम प्रज्ञापूर्वक कर्मों में लगे रहने के द्वारा सोम का शरीर में रक्षण करनेवाले बनें।
Subject
क्रुङ [Swan] का क्षीरपान