Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 72

95 Mantra
19/72
Devata- सोमो देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सोमो॒ राजा॒मृत॑ꣳ सु॒तऽऋ॒जी॒षेणा॑जहान्त्मृ॒त्युम्। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमि॑न्द्रि॒यं वि॒पान॑ꣳ शु॒क्रमन्ध॑स॒ऽइन्द्र॑स्येन्द्रि॒यमि॒दं पयो॒ऽमृतं॒ मधु॑॥७२॥

सोमः॑ राजा॑। अ॒मृत॑म्। सु॒तः। ऋ॒जी॒षेण॑। अ॒ज॒हा॒त्। मृ॒त्युम्। ऋ॒तेन॑। स॒त्यम्। इ॒न्द्रि॒यम्। वि॒पान॒मिति॑ वि॒ऽपान॑म्। शु॒क्रम्। अन्ध॑सः। इन्द्र॑स्य। इ॒न्द्रि॒यम्। इ॒दम्। पयः॑। अ॒मृत॑म्। मधु॑ ॥७२ ॥

Mantra without Swara
सोमो राजामृतँ सुत ऋजीषेणाजहान्मृत्युम् । ऋतेन सत्यमिन्द्रियँविपानँ शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदम्पयो मृतम्मधु ॥

सोमः राजा। अमृतम्। सुतः। ऋजीषेण। अजहात्। मृत्युम्। ऋतेन। सत्यम्। इन्द्रियम्। विपानमिति विऽपानम्। शुक्रम्। अन्धसः। इन्द्रस्य। इन्द्रियम्। इदम्। पयः। अमृतम्। मधु॥७२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार क्रियाशीलता के द्वारा वासनाओं से ऊपर उठ जाने पर शरीर में सोम सुरक्षित रहता है और यह (सोम:) = सोम (राजा) = [राजू दीप्तौ] उसके जीवन को दीप्त करनेवाला होता है। २. (अमृतम्) = यह सोम अमृत है। यह अपने रक्षा करनेवाले की अमरता का कारण बनता है, उसे रोगों का शिकार नहीं होने देता। ३. (सुतः) = निष्पादित हुआ हुआ यह सोम (ऋजीषेण) = [सरल भावेन-द०] जीवन में सरलता के मार्ग से चलने के द्वारा- सरलभाव को अपनाने के द्वारा (मृत्युम्) = मृत्यु को अजहात् छोड़ता है, अर्थात् सोम की रक्षा करनेवाला पुरुष सरलवृत्तिवाला होता है और जीवन में व्यर्थ की चिन्ताओं से रहित होने के कारण वह कभी अकालमृत्यु का ग्रास नहीं होता । सोमरक्षा से जीवन सौम्य व शान्त होता है। शान्त व सरल पुरुष अवश्य पूर्ण आयुष्य प्राप्त करता है। २. (शुक्रं ऋतेन) = यह सोम मानव-जीवन में व्यवस्था [राजा] व नियमितता के द्वारा [ऋत] सत्य का वर्धन करनेवाला होता है, (इन्द्रियम्) = एक-एक इन्द्रिय की शक्ति का वर्धक होता है, (विपानम्) = यह उसकी विशेषरूप से रक्षा करनेवाला होता है। सत्य के वर्धन के द्वारा यह सोम मन को दीप्त करता है, इन्द्रियों की शक्ति के वर्धन से इन्द्रियों को उज्ज्वल बनाता है, और शरीर की रोगों से विशेषरूप से रक्षा करके शरीर को तेजस्वी बनाता है। एवं, शरीर इन्द्रियों व मन को दीप्त करने के कारण इसका 'शुक्र' यह नाम सार्थक ही है, [शुच दीप्तौ ] । ३. (अन्धसः) = अन्न से, अध्यायनीय-अत्यन्त ध्यान देने योग्य सात्त्विक अन्न से उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (इन्द्रस्य) = जीवात्मा के (इन्द्रियम्) = प्रत्येक अङ्ग की शक्ति का वर्धन करनेवाला होता है । (इदम्) = यह उसका (पयः) - आप्यायन करनेवाला होता है, (अमृतम्) = यह उसे रोगों द्वारा मृत्यु का शिकार नहीं होने देता। (मधु) = यह उसके जीवन को अत्यन्त मधुर बना देता है।
Essence
भावार्थ- सोम की रक्षा करनेवाला व्यक्ति सरल वृत्ति व स्वभाव का बनता है। इसके जीवन में व्यर्थ की चिन्ताएँ उत्पन्न नहीं होतीं, इसीलिए यह दीर्घजीवी बनता है। इसके जीवन में सत्य तथा माधुर्य होता है।
Subject
सोम तथा अमरता