Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 69

95 Mantra
19/69
Devata- पितरो देवताः Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधा॒ यथा॑ नः पि॒तरः॒ परा॑सः प्र॒त्नासो॑ऽअग्नऽऋ॒तमा॑शुषा॒णाः। शुचीद॑य॒न् दीधि॑तिमुक्थ॒शासः॒ क्षामा॑ भि॒न्दन्तो॑ऽअरु॒णीरप॑ व्रन्॥६९॥

अध॑। यथा॑। नः॒। पि॒तरः॑। परा॑सः। प्र॒त्नासः॑। अ॒ग्ने॒। ऋ॒तम्। आ॒शु॒षा॒णाः। शुचि॑। इत्। अ॒य॒न्। दीधि॑तिम्। उ॒क्थ॒शासः॑। उ॒क्थ॒शास॒ इत्यु॑क्थ॒ऽशसः॑। क्षामा॑। भि॒न्दन्तः॑। अ॒रु॒णीः। अप॑। व्र॒न् ॥६९ ॥

Mantra without Swara
अधा यथा नः पितरः परासः प्रत्नासोऽअग्नऽऋतमाशुषाणाः । शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन् ॥

अध। यथा। नः। पितरः। परासः। प्रत्नासः। अग्ने। ऋतम्। आशुषाणाः। शुचि। इत्। अयन्। दीधितिम्। उक्थशासः। उक्थशास इत्युक्थऽशसः। क्षामा। भिन्दन्तः। अरुणीः। अप। व्रन्॥६९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अध) = अब (यथा) = जैसे (न:) = हमारे (पितर:) = पितर (परासः) = जो उत्कृष्ट हैं-विद्या आदि गुणों से उत्कर्ष को प्राप्त हैं, (प्रत्नासः) = आयुष्य में भी बड़े हैं, (ऋतम् आशुषाणा:) = [यज्ञं व्याप्नुवन्तः] यज्ञादि उत्तमकर्मों में व्याप्त हुए हुए हैं। (शुचि दीधितिं इत् अयन्) = पवित्र ज्ञान की किरणों को जिन्होंने प्राप्त किया है और (उक्थशासः) = [उक्थानि शंसन्ति] कहने के योग्य ज्ञान - वचनों का शंसन करते हैं । २. (क्षामा भिन्दन्तः) = पार्थिव भोगों का विद्रावण करते हुए [क्षामा - पृथिवी, पार्थिव भोग] (अरुणी:) = अविद्या के अन्धकार की नाशक ज्ञानकिरणों को (अपव्रन्) = आच्छादन व आवरणरहित करते हैं। हे (अग्ने) परमात्मन्! आप ऐसा ही करें। आपकी कृपा से ऐसा ही हो।
Essence
भावार्थ- हम उन ज्ञानी पितरों का सम्पर्क प्राप्त करें जो गुणों से उत्कृष्ट हैं, वयोवृद्ध हैं, यज्ञादि कर्मों में व्याप्त जीवनवाले हैं, पवित्र ज्ञान-किरणों को प्राप्त हैं, उक्थों का शंसन करनेवाले, पार्थिव भोगों से ऊपर उठे हुए तथा ज्ञान की किरणों को अनावृत करनेवाले हैं।
Subject
पर प्राण पितर