Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 66

95 Mantra
19/66
Devata- अग्निर्देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्नऽईडि॒तः क॑व्यवाह॒नावा॑ड्ढ॒व्यानि॑ सुर॒भीणि॑ कृ॒त्वी। प्रादाः॑ पि॒तृभ्यः॑ स्व॒धया॒ तेऽअ॑क्षन्न॒द्धि त्वं दे॑व॒ प्रय॑ता ह॒वीषि॥६६॥

त्वम्। अ॒ग्ने॒। ई॒डि॒तः। क॒व्य॒वा॒ह॒नेति॑ कव्यऽवाहन। अवा॑ट्। ह॒व्यानि॑। सु॒र॒भीणि॑। कृ॒त्वी। प्र। अ॒दाः॒। पि॒तृभ्य॒ इति॑ पि॒तृऽभ्यः॑। स्व॒धया॑। ते। अ॒क्ष॒न्। अ॒द्धि। त्वम्। दे॒व॒। प्रय॒तेति॒ प्रऽय॑ता। ह॒वीषि॑ ॥६६ ॥

Mantra without Swara
त्वमग्नऽईडितः कव्यवाहनावाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी । प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वन्देव प्रयता हवीँषि ॥

त्वम्। अग्ने। ईडितः। कव्यवाहनेति कव्यऽवाहन। अवाट्। हव्यानि। सुरभीणि। कृत्वी। प्र। अदाः। पितृभ्य इति पितृऽभ्यः। स्वधया। ते। अक्षन्। अद्धि। त्वम्। देव। प्रयतेति प्रऽयता। हवीषि॥६६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार जब शिष्य आचार्य से सुने हुए पाठ को फिर से सुना देता है तब वह आचार्य के समान ही कव्य का वहन करनेवाला हो जाता है। यह 'कव्यवाहन' कहलाता है, क्रान्तदर्शी पुरुष के ज्ञान को धारण करनेवाला । मन्त्र में इसके लिए कहते हैं, कि हे (अग्ने) = प्रगतिशील व ज्ञान से अग्नि के समान चमकनेवाले ! (कव्यवाहन) = क्रान्तदर्शी के ज्ञान का वहन करनेवाले ! (त्वम्) = तू (ईडित:) = [ईडितं अस्य अस्ति इति] उपासनावाला पुरुष बनता है। तू उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करके प्रभु का उपासक बनता है। २. (हव्यानि) = इन ग्रहण योग्य विज्ञानों को (सुरभीणि कृत्वी) = बड़ा सुगन्धित करके (अवाट्) = तू प्रजाओं में इनका प्राप्त करानेवाला बनता है। इन ज्ञानों का प्रचार तू इस मधुरता से करता है कि चारों ओर सुगन्ध-ही-सुगन्ध फैलती है। ३. तू (पितृभ्यः) = उन ज्ञानप्रद पितरों के लिए (हव्यानि) = उत्तम सेवनीय पदार्थों को (प्रादाः) = देता है, (ते) = वे इन पदार्थों को (स्वधया) = आत्मधारण के दृष्टिकोण से (अक्षन्) = खाते हैं। वे उतना ही भोजन करते हैं, जितना कि शरीरधारण के लिए पर्याप्त हो। ४. हे (देव) = ज्ञान की दीप्तवाले विद्वन् ! (त्वम्) = तू भी प्रयता शुद्ध (हवींषि) = हव्य पदार्थों का ही (अद्धि) = सेवन कर। तू भी सात्त्विक भोजनों को ही कर 'प्रयता' का अर्थ आचार्य दयानन्द ने 'प्रयत्नेन साधिताभिः ' प्रयत्न से प्राप्त पदार्थ किया है, श्रम से कमाये हुए भोजन को ग्रहण करने से ही सात्त्विकता बनी रहती है।
Essence
प्रयत्नार्जित भावार्थ- हम उत्कृष्ट ज्ञान को धारण करें। २. उसे बड़े मिठास के साथ लोगों तक पहुँचाएँ ३. आचार्यों को, पितरों को सात्त्विक अन्न देनेवाले हों। स्वयं भी पवित्र, हव्य पदार्थों को ही खाएँ ।
Subject
उतना ही जितना आवश्यक