Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 61

95 Mantra
19/61
Devata- पितरो देवता Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्नि॒ष्वा॒त्तानृ॑तु॒मतो॑ हवामहे नाराश॒ꣳसे सो॑मपी॒थं यऽआ॒शुः। ते नो॒ विप्रा॑सः सु॒हवा॑ भवन्तु व॒य स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥६१॥

अ॒ग्नि॒ष्वा॒त्तान्। अ॒ग्नि॒स्वा॒त्तानित्य॑ग्निऽस्वा॒त्तान्। ऋ॒तु॒मत॒ इत्यृ॑तु॒ऽमतः॑। ह॒वा॒म॒हे॒। ना॒रा॒श॒ꣳसे। सो॒म॒पी॒थमिति॑ सोमऽपी॒थम्। ये। आ॒शुः। ते। नः॒। विप्रा॑सः। सु॒हवा॒ इति॑ सु॒ऽहवाः॑। भ॒व॒न्तु॒। व॒यम्। स्या॒म॒। पत॑यः। र॒यी॒णाम्। ॥६१ ॥

Mantra without Swara
अग्निष्वात्ताँऽऋतुमतो हवामहे नाराशँसे सोमपीथँयऽआशुः । ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयँस्याम पतयो रयीणाम् ॥

अग्निष्वात्तान्। अग्निस्वात्तानित्यग्निऽस्वात्तान्। ऋतुमत इत्यृतुऽमतः। हवामहे। नाराशꣳसे। सोमपीथमिति सोमऽपीथम्। ये। आशुः। ते। नः। विप्रासः। सुहवा इति सुऽहवाः। भवन्तु। वयम्। स्याम। पतयः। रयीणाम्।॥६१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अग्निष्वात्तान्) = ग्रहण की है अग्नि आदि पदार्थों की विद्या जिन्होंने उन (ऋतुमतः) = प्रशस्त ऋतुओंवाले, अर्थात् ऋतुओं के अनुसार दिनचर्यावाले पितरों को हम (नाराशंसे) = नरसमूह के लिए (आशंसनीय) = प्रशस्त धर्मों को करने के निमित्त (हवामहे) पुकारते हैं । २. हम उन पितरों को पुकारते हैं (ये) = जो (सोमपीथम्) = सोम के पान को (आशुः) = [ अश्नन्ति ] खाते हैं। सोमपान करनेवाले पितर ही स्वस्थ रहकर नरों के लिए हितकर कार्यों के करनेवाले होते हैं। ३. (ते विप्रासः) = विशेषरूप से अपना पूर्ण करनेवाले पितर (नः) = हमारे लिए (सुहवा:) = सुगमता से आमन्त्रित करने योग्य (भवन्तु) हों और इनके उपदेशों को सुनकर तथा इनसे प्रेरणा प्राप्त करके (वयम्) = हम (रयीणाम्) = धनों के (पतयः स्याम) = सदा पति ही बने रहें, हम कभी धन के दास न बन जाएँ। धन को साधन के रूप में देखते हुए हम भी [क] अग्निष्वात्त बनने का प्रयत्न करें - उत्कृष्ट ज्ञानी बनें, पदार्थविद्या का खूब अध्ययन करें। [ख] ऋतुमान बनें, ऋतुओं के अनुकूल हमारी दिनचर्या हो । [ग] नरहित के लिए प्रशंसनीय कर्मों को करनेवाले बनें। [घ] सोमपान से शक्ति की रक्षा का पूरा ध्यान करें।
Essence
भावार्थ- हम अग्नि आदि सब पदार्थों के विज्ञान में कुशल बनकर ऋतु के अनुसार भोजनादि क्रियाओं को करते हुए नरहित के प्रशंसनीय कर्मों को करनेवाले बनें। इस नाराशंस के निमित्त सोमपान करें, अर्थात् शरीर में सोम की रक्षा करें।
Subject
नाराशंस में सोमपान