Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 51

95 Mantra
19/51
Devata- पितरो देवताः Rishi- शङ्ख ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ये नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ सो॒म्यासो॑ऽनूहि॒रे सो॑मपी॒थं वसि॑ष्ठाः। तेभि॑र्य॒मः स॑ꣳररा॒णो ह॒वीष्यु॒शन्नु॒शद्भिः॑ प्रतिका॒म॑मत्तु॥५१॥

ये। नः॒। पूर्वे॑। पि॒तरः॑। सो॒म्यासः॑। अ॒नू॒हि॒र इत्य॑नुऽऊहि॒रे। सो॒म॒पी॒थमिति॑। सोमऽपी॒थम्। वसि॑ष्ठाः। तेभिः॑। य॒मः। स॒ꣳर॒रा॒ण इति॑ सम्ऽररा॒णः। ह॒वीषि॑। उ॒शन्। उ॒शद्भिरित्यु॒शत्ऽभिः॑। प्र॒ति॒का॒ममिति॑ प्रतिऽका॒मम्। अ॒त्तु॒ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो नूहिरे सोमपीथँ वसिष्ठाः । तेभिर्यमः सँरराणो हवीँष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥

ये। नः। पूर्वे। पितरः। सोम्यासः। अनूहिर इत्यनुऽऊहिरे। सोमपीथमिति। सोमऽपीथम्। वसिष्ठाः। तेभिः। यमः। सꣳरराण इति सम्ऽरराणः। हवीषि। उशन्। उशद्भिरित्युशत्ऽभिः। प्रतिकाममिति प्रतिऽकामम्। अत्तु॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ये) = जो (नः) = हमारे (पूर्वे) = अपना पूरण करनेवाले, हमसे पहले काल में होनेवाले (पितरः) = पिता-पितामह व प्रपितामह हैं जो (सोम्यासः) = अत्यन्त सौम्य स्वभाववाले हैं, और (वसिष्ठा:) = अत्यन्त उत्तम निवासवाले, अधिक-से-अधिक पूर्ण (सोमपीथम्) = सोम के पान को (अनु+उहिरे) = प्रतिदिन धारण करते हैं, २.( तेभिः) = उन पितरों के साथ (संरराण:) = [संप्रियमाण:] प्रीति व आनन्द का अनुभव करता हुआ (यमः) = नियन्त्रित जीवनवाला सन्तान (हवींषि) = दानपूर्वक अदन को, यज्ञशेष को (उशन्) = चाहता हुआ (उशद्भिः) = चाहते हुए पितरों के साथ (प्रतिकामम्) = शरीर की चाहना - आवश्यकता [ want] के अनुसार (अत्तु) = खाये । ३. यहाँ भोजन के विषय में निम्न बातें सुव्यक्त हैं- [क] वही भोजन खाना है जिसकी शरीर को आवश्यकता हो [प्रतिकामम्], 'यह मकान मरम्मत चाहता है' इस वाक्य में चाहना की जो भावना है, वही 'प्रतिकाम' शब्द में निहित है। शरीर को जिस भोजनांश की आवश्यकता है वही भोजनाश इसे प्राप्त कराना चाहिए। [ख] भोजन को प्रसन्नतापूर्वक खाना चाहिए [उशन्] । प्रसन्नतापूर्वक खाया गया भोजन ही रुधिरादि उत्तम धातुओं को उत्पन्न करता है, अन्यथा कुछ विष उत्पन्न हो जाते हैं, जो रोगों व अकालमृत्यु के कारण बनते हैं। [ग] हमारा भोजन सदा यज्ञशेष ही हो। देकर बचे हुए को ही खाना है [हवींषि ] । अकेला खानेवाला पाप का ही सेवन करता है। [घ] 'यमः' यह कर्तृपद इस बात की सूचना भी देता है कि भोजन वही करना चाहिए जो संयम के अनुकूल हो । उत्तेजक भोजन हमारी वृत्ति को असंयत बनानेवाले हैं, अतः त्याज्य हैं।
Essence
भावार्थ- हम भोजन वह करें, जिसकी शरीर को आवश्यकता है। उसे सदा प्रसन्नतापूर्वक ही खाएँ। हमारा भोजन यज्ञशेष हो, हविरूप हो। उत्तेजक भोजनों से हम बचने का प्रयत्न करें। सदा सोम का पान करनेवाले, शक्ति की रक्षा करनेवाले बनें।
Subject
सात्त्विक भोजन