Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 45

95 Mantra
19/45
Devata- पितरो देवताः Rishi- वैखानस ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ये स॑मा॒नाः सम॑नसः पि॒तरो॑ यम॒राज्ये॑। तेषां॑ लो॒कः स्व॒धा नमो॑ य॒ज्ञो दे॒वेषु॑ कल्पताम्॥४५॥

ये। स॒मा॒नाः। सम॑नस॒ इति॒ सऽम॑नसः। पि॒तरः॑। य॒म॒राज्य॒ इति॑ यम॒ऽराज्ये॑। तेषा॑म्। लो॒कः। स्व॒धा। नमः॑। य॒ज्ञः। दे॒वेषु॑। क॒ल्प॒ता॒म् ॥४५ ॥

Mantra without Swara
ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये । तेषाँलोकः स्वधा नमो यज्ञो देवेषु कल्पताम् ॥

ये। समानाः। समनस इति सऽमनसः। पितरः। यमराज्य इति यमऽराज्ये। तेषाम्। लोकः। स्वधा। नमः। यज्ञः। देवेषु। कल्पताम्॥४५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ये) = जो हमारे (पितरः) = पिता-पितामह प्रपितामह आदि (समाना:) = सुख-दुःख में समानवृत्तिवाले होते हैं, 'नित्यं च समचित्तकं, इष्टानिष्टोपपत्तिषु' = इष्ट-अनिष्ट प्राप्ति में समचित्त रहते हैं। जो शुभाशुभ को प्राप्त करके न तो हर्ष से फूलते हैं और न ही उदास हो जाते हैं। २. (समनस:) = [समानं मनो विज्ञानं येषां ] और समान विज्ञानवाले होते हैं ३. (यमराज्ये) = जो यम के राज्य में निवास करते हैं, अर्थात् जो सदा नियन्त्रित जीवन बिताते हैं। ४. (तेषाम्) = उन्हें (लोक:) = उत्तम लोक व यश की प्राप्ति होती है, (स्वधा) = उन्हें आत्मधारण के लिए पर्याप्त अन्न प्राप्त होता है, (नमः) = उनमें नमन की वृत्ति होती है। ५. उनका (यज्ञः) = सङ्ग (देवेषु) = दिव्य गुणों के उत्पादन में (कल्पताम्) = समर्थ हो । उनके सङ्ग से हममें भी दिव्य गुण उत्पन्न हों।
Essence
भावार्थ - १. 'पितर' शब्द से कहलाने योग्य व्यक्ति वे हैं जो [क] समचित्त-स्थितप्रज्ञ हैं। [ख] समान विज्ञानवाले हैं। [ग] नियन्त्रण के संसार में विचरते हैं, अर्थात् व्रती जीवनवाले हैं । २. इन पितरों को [क] उत्तम यश प्राप्त होता है। [ख] धारण के लिए आवश्यक अन्न दुर्लभ नहीं होता। [ग] इनमें नमन की वृत्ति होती है अथवा इन्हें सब नमस्कार करते हैं। ३. इनका सङ्ग हमें भी दिव्य गुणोंवाला बनाए ।
Subject
यमराज्य में