Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 36

95 Mantra
19/36
Devata- पितरो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पि॒तृभ्यः॑ स्वधा॒यिभ्यः॑ स्व॒धा नमः॑ पिताम॒हेभ्यः॑ स्वधा॒यिभ्यः॑ स्व॒धा नमः॒ प्रपि॑तामहेभ्यः स्वधा॒यिभ्यः॑ स्व॒धा नमः॑। अक्ष॑न् पि॒तरोऽमी॑मदन्त पि॒तरोऽती॑तृपन्त पि॒तरः॒ पित॑रः॒ शुन्ध॑ध्वम्॥३६॥

पि॒तृभ्य॒ इति॑ पि॒तृऽभ्यः॑। स्व॒धा॒यिभ्य॒ इति॑ स्वधा॒यिऽभ्यः॑। स्व॒धा। नमः॑। पि॒ता॒म॒हेभ्यः॑। स्व॒धा॒यिभ्य॒ इति॑ स्वधा॒यिऽभ्यः॑। स्व॒धा। नमः॑। प्रपि॑तामहेभ्य॒ इति॒ प्रऽपि॑तामहेभ्यः। स्व॒धा॒यिभ्य॒ इति॑ स्वधा॒यिऽभ्यः॑। स्व॒धा। नमः॑। अक्ष॑न्। पि॒तरः॑। अमी॑मदन्त। पि॒तरः॑। अती॑तृपन्त। पि॒तरः॑। पित॑रः। शुन्ध॑ध्वम् ॥३६ ॥

Mantra without Swara
पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः । अक्षन्पितरःऽअमीमदन्त पितरोतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम् ॥

पितृभ्य इति पितृऽभ्यः। स्वधायिभ्य इति स्वधायिऽभ्यः। स्वधा। नमः। पितामहेभ्यः। स्वधायिभ्य इति स्वधायिऽभ्यः। स्वधा। नमः। प्रपितामहेभ्य इति प्रऽपितामहेभ्यः। स्वधायिभ्य इति स्वधायिऽभ्यः। स्वधा। नमः। अक्षन्। पितरः। अमीमदन्त। पितरः। अतीतृपन्त। पितरः। पितरः। शुन्धध्वम्॥३६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार सोम का रक्षण करनेवाले युवक व युवति रसमय व मधुर जीवनवाले बने रहते हैं। उनके मन शिव होते हैं और उनका ज्ञान दीप्त होता है। इस प्रकार उत्तम जीवनवाले वे दम्पती वानप्रस्थाश्रम में प्रविष्ट हुए हुए अपने पिता, पितामह व प्रपितामह को समय-समय पर आमन्त्रित करते हैं। इन पितरों को वे 'स्वधा' = अन्न प्राप्त कराते हैं तथा 'नमः' उनका सत्कार करते हैं। इनके आमन्त्रण को स्वीकार करके वे पितर आते हैं और इसीलिए वे 'स्वधायी' = [स्वधां प्रति एतुं शीलं यस्य] कहलाते हैं। इन स्वधायिभ्यः = स्वधा के प्रति आने के स्वभाववाले (पितृभ्यः) = पिताओं कि लिए (स्वधा नमः) = अन्न तथा सत्कार हो । २. इसी प्रकार (स्वधायिभ्यः) = स्वधा के प्रति आनेवाले (पितामहेभ्यः) = पितामहों के लिए (स्वधा नमः) = अन्न व सत्कार हो तथा (स्वधायिभ्यः) = स्वधा के प्रति आनेवाले (प्रपितामहेभ्यः) = परदादों के लिए (स्वधा नमः) = अन्न व सत्कार हो । ३. यहाँ मन्त्र में आमन्त्रण क्रम पिता पितामह व प्रपितामह है, यद्यपि आयु की दृष्टि से बड़प्पन का मान करते हुए यह क्रम प्रपितामह-पितामह-पिता होना चाहिए तथापि सम्भावना का ध्यान करते हुए यह क्रम बदल दिया गया है। पिता जो ५१ व ५२ वर्ष के होंगे उनके आने का तो सम्भव है ही । पितामह भी ७४ व ७५ वर्ष की आयु होने से सम्भवतः आएँ, परन्तु इस समय तक जो १०० वर्ष से ऊपर के होंगे उनके आने का संशय ही है। पिता से सम्बन्ध का सामीप्य भी है। जो पिता से सम्बन्ध है, पितामह से उतना नहीं होता और प्रपितामह से यह सम्बन्ध और भी दूर का होता है। सन्तान पर पिता का प्रभाव अधिक पड़ता है, पितामह का इससे कम और प्रपितामह का उससे भी कम, परन्तु फिर भी युवक दम्पती इन सभी को आमन्त्रित करते हैं और उनका भोजनादि के द्वारा मान करते हैं । ४. ये युवक बड़े प्रसन्न होते हैं कि उनके आमन्त्रण को स्वीकार करके (पितरः अक्षन्) = पितरों ने भोजन किया है और (पितरः अमीमदन्त) = पितर प्रसन्न हुए हैं, और (पितरः अतीतृपन्त) = उन पितरों ने तृप्ति का अनुभव किया है। ५. अब प्रसन्न व तृप्त पितरों से ये प्रार्थना करते हैं कि हे (पितरः शुन्धध्वम्) = आप उत्तम उपदेश व प्रेरणाओं से हमारे जीवनों को शुद्ध कीजिए। वस्तुतः पितृश्राद्ध का सर्वमहान् लाभ यही है कि हम अपने उन पितरों से अपने कुलधर्मों व जातिधर्मों का उपदेश ग्रहण करके अपने जीवन में प्रेरणा प्राप्त करते हैं तथा उनके आशीर्वादों से शुभमार्ग पर चलने की शक्ति का अनुभव करते हैं।
Essence
भावार्थ- हम पिता - पितामह व प्रपितामहों को वानप्रस्थाश्रमों से समय-समय पर घर में आमन्त्रित करें। उनका अन्नादि द्वारा सत्कार करें। उनसे उपदेश व प्रेरणा लेकर अपने जीवनों को शुद्ध बनाएँ।
Subject
पितृश्राद्ध