Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 35

95 Mantra
19/35
Devata- सोमो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- विराट् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदत्र॑ रि॒प्तꣳ र॒सिनः॑ सु॒तस्य॒ यदिन्द्रो॒ऽअपि॑ब॒च्छची॑भिः। अ॒हं तद॑स्य॒ मन॑सा शि॒वेन॒ सोम॒ꣳ राजा॑नमि॒ह भ॑क्षयामि॥३५॥

यत्। अत्र॑। रि॒प्तम्। र॒सिनः॑। सु॒तस्य॑। यत्। इन्द्रः॑। अपि॑बत्। शची॑भिः। अ॒हम्। तत्। अ॒स्य॒। मन॑सा। शि॒वेन॑। सोम॑म्। राजा॑नम्। इ॒ह। भ॒क्ष॒या॒मि॒ ॥३५ ॥

Mantra without Swara
यदत्र रिप्तँ रसिनः सुतस्य यदिन्द्रोऽअपिबच्छचीभिः । अहन्तदस्य मनसा शिवेन सोमँ राजानमिह भक्षयामि॥

यत्। अत्र। रिप्तम्। रसिनः। सुतस्य। यत्। इन्द्रः। अपिबत्। शचीभिः। अहम्। तत्। अस्य। मनसा। शिवेन। सोमम्। राजानम्। इह। भक्षयामि॥३५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (यत्) = जो (रसिन:) = रसवाले जीवन को माधुर्य से भरनेवाले सुतस्य अभिषुत (उत्पन्न) सोम का (रिप्तम्) = (लिप्तं प्राप्तम् द.) अंश प्राप्त हुआ है, (यत्) = जिस अंश को (इन्द्रः) = इन्द्रियों का विजेता जीवात्मा (शचीभिः) = ज्ञानों व कर्मों के द्वारा तथा प्रभुनाम जपन के द्वारा (अपिबत्) = अपने अन्दर पीता है, अर्थात् व्याप्त कर लेता है। २. स्पष्ट है कि सोम जीवन को मधुर बनानेवाला है [ रसिन: ], इसके अभाव में शरीर में रोग आ जाते हैं और मन में ईर्ष्या-द्वेष आदि पनपने लगते हैं, इस प्रकार मनुष्य का जीवन कड़वा हो जाता है । ३. इस सोम को शरीर में ही सुरक्षित रखने का साधन यह है कि मनुष्य यज्ञ-यागादि उत्तम कर्मों में लगा रहे और अपने अतिरिक्त समय को ज्ञान प्राप्ति में लगाये। [ शचीभिः] उससे भी श्रान्त हो जाने पर वाणी से प्रभु का नाम जपने में प्रवृत्त हो। ४. (अहम्) = मैं भी (अस्य) = इस सोम के (तत्) = उस अंश को (शिवेन मनसा) = शिव मन के हेतु से (भक्षयामि) = अपना भाग बनाता हूँ। इस सोम की रक्षा से मेरा मन शिव वृत्तिवाला बनता है, उसमें सभी के कल्याण की भावना उत्पन्न होती है । ५. वस्तुतः सोम के इन सब लाभों का विचार करके कि [क] यह मेरे जीवन को माधुर्यवाला बनाता है, [ख] इसके रक्षण से मेरा मन शिव बनता है, मैं (इह) = यहाँ मानव-जीवन में (सोमं राजानम्) = मेरे जीवन को दीप्त करनेवाले इस सोम को (भक्षयामि) = अपना भोजन बनाता हूँ। इसे अपने शरीर के अन्दर ही व्याप्त करने का प्रयत्न करता हूँ।
Essence
भावार्थ - १. सोमरक्षा का प्रकार यह है कि हम कर्मों में लगे रहें, ज्ञान प्राप्त करें और प्रभु के नाम का जप करें। २. रक्षित सोम [क] हमारे जीवन को मधुर बनाएगा, [ख] मन को शिव बनाएगा [रसिनः] तथा [ग] हमारे मस्तिष्क को ज्ञान- दीप्त करेगा [राजानम्] ।
Subject
शची द्वारा सोमपान