Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 32

95 Mantra
19/32
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सुरा॑वन्तं बर्हि॒षद॑ꣳ सु॒वीरं॑ य॒ज्ञꣳ हि॑न्वन्ति महि॒षा नमो॑भिः। दधा॑नाः॒ सोमं॑ दि॒वि दे॒वता॑सु॒ मदे॒मेन्द्रं॒ यज॑मानाः स्व॒र्काः॥३२॥

सुरा॑वन्त॒मिति॒ सुरा॑ऽवन्तम्। ब॒र्हि॒षद॑म्। ब॒र्हि॒षद॒मिति॑ बर्हि॒ऽसद॑म्। सु॒वीर॒मिति॑ सु॒ऽवीर॑म्। य॒ज्ञम्। हि॒न्व॒न्ति॒। म॒हि॒षाः। नमो॑भि॒रिति॒ नमः॑ऽभिः। दधा॑नाः। सोम॑म्। दि॒वि। दे॒वता॑सु। मदे॑म। इन्द्र॑म्। यज॑मानाः। स्व॒र्का इति॑ सुऽअ॒र्काः ॥३२ ॥

Mantra without Swara
सुरावन्तम्बर्हिषदँ सुवीरँयज्ञँ हिन्वन्ति महिषा नमोभिः । दधानाः सोमन्दिवि देवतासु मदेमेन्द्रँयजमानाः स्वर्काः ॥

सुरावन्तमिति सुराऽवन्तम्। बर्हिषदम्। बर्हिषदमिति बर्हिऽसदम्। सुवीरमिति सुऽवीरम्। यज्ञम्। हिन्वन्ति। महिषाः। नमोभिरिति नमःऽभिः। दधानाः। सोमम्। दिवि। देवतासु। मदेम। इन्द्रम्। यजमानाः। स्वर्का इति सुऽअर्काः॥३२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार सौत्रामणी यज्ञ के करनेवाले (महिषा) = [मह् पूजायाम्] पूजा की वृत्तिवाले साधक (नमोभिः) = नमस् के द्वारा, अपने जीवन में नम्रता-धारण के द्वारा (यज्ञम्) = पूजनीय प्रभु को (हिन्वन्ति) = अपने में बढ़ाते हैं, अर्थात् अपने हृदयों में प्रभु की भावना को उज्ज्वल करते हैं। उस प्रभु की भावना को, जो २ [क] (सुरावन्तम्) = [सुर् to shine] ज्ञान की दीप्तिवाले हैं, सारे ज्ञान के स्रोत हैं। वे ही आदिगुरु हैं, सभी को ज्ञान देनेवाले हैं। [ख] (बर्हिषदम्) = वासनाशून्य पवित्र हृदय में स्थित होनेवाले हैं। [ग] (सुवीरम्) = [शोभना वीरा शरीरात्मबलयुक्ता यस्मात् तम् ] जिस प्रभु के उपासन से उपासक शरीर व आत्मा के बल से युक्त होते हैं । ३. इस प्रभु के उपासन से वासनाशून्य होकर हम वीर्य को सुरक्षित कर पाते हैं और (सोमं दधानाः) = इस सोम का धारण करते हुए, (दिवि) = प्रकाश में तथा (देवतासु) = दिव्य गुणों में अपने को धारण करते हुए हम (मदेम) = हर्ष का अनुभव करें। मस्तिष्क में ज्ञान के प्रकाश तथा मन में वासनाशून्यता के कारण एक अदभुत आनन्द का अनुभव होता है। ४. हम (इन्द्रं यजमाना:) = उस घर में ऐश्वर्यशाली प्रभु को अपने साथ सङ्गत करते हुए (स्वर्का:) = उत्तम उपासनवाले हों तथा उत्तम अन्नों का [ अर्क= अन्न- नि० ] सेवन करनेवाले हों। प्रभु के सम्पर्क के लिए उत्तम सात्त्विक अन्न सहायक होते हैं। इनसे अन्तःकरण की शुद्धि होकर स्मृति ठीक बनी रहती है, वासना-ग्रन्थियों का विनाश होकर हम प्रभु-दर्शन के योग्य हो जाते हैं।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु का उपासन करें। प्रभु-उपासन के लिए चित्तवृत्ति को ठीक रखने के उद्देश्य से सात्त्विक अन्न का सेवन करें।
Subject
प्रभु का वर्धन