Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 20

95 Mantra
19/20
Devata- यजमानो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प॒शुभिः॑ प॒शूना॑प्नोति पुरो॒डाशै॑र्ह॒वीष्या। छन्दो॑भिः सामिधे॒नीर्या॒ज्याभिर्वषट्का॒रान्॥२०॥

प॒शुभि॒रिति॑ प॒शुभिः॑। प॒शून्। आ॒प्नो॒ति॒। पु॒रो॒डाशैः॑। ह॒वीषि॑। आ। छन्दो॑भि॒रिति॒ छन्दः॑ऽभिः। सा॒मि॒धे॒नीरिति॑ साम्ऽइधे॒नीः। या॒ज्या᳖भिः। व॒ष॒ट्का॒रानिति॑ वषट्ऽका॒रान् ॥२० ॥

Mantra without Swara
पशुभिः पशूनाप्नोति पुरोडाशैर्हवीँष्या । छन्दोभिः सामिधेनीर्याज्याभिर्वषट्कारान् ॥

पशुभिरिति पशुभिः। पशून्। आप्नोति। पुरोडाशैः। हवीषि। आ। छन्दोभिरिति छन्दःऽभिः। सामिधेनीरिति साम्ऽइधेनीः। याज्याभिः। वषट्कारानिति वषट्ऽकारान्॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (पशुभिः) = पशुओं से (पशून्) = पशुओं को (आप्नोति) = प्राप्त करता है। यदि दौर्भाग्यवश माता-पिता में 'कामः पशुः क्रोधः पशुः ' इस उपनिषद् वाक्य के अनुसार काम-क्रोधादि पशुवृत्तियाँ प्रबल होंगी तो वे इन पशुवृत्तियों की प्रबलतावाले सन्तानों को ही प्राप्त करेंगे। २. (पुरोडाशैः) = [पुर: दाश्नोति = kill] परन्तु सबसे प्रथम इन काम-क्रोधादि के संहार से (पुरोडाशान्) = सबसे प्रथम काम-क्रोध का संहार करनेवाली सन्तानों को प्राप्त करता है । ३. (हविर्भिः) = [हु दानादनयोः] दानपूर्वक अदन की वृत्तियों से (हवींषि आप्नोति) = देकर खाने की वृत्तिवाले सन्तानों को पाता है ४. (छन्दोभिः) = [छन्दांसि छादनात् ] अपने को पापों से बचाने की वृत्तियों से (छन्दांसिः) = अपने को पाप से बचानेवाले सन्तानों को प्राप्त करता है ५. (सामिधेनीभि:) = अपने में ज्ञान की समिधाओं के आधान की वृत्तियों से, अर्थात् ज्ञानदीप्तियों के द्वारा (सामिधेनी:) = ज्ञानदीप्तियोंवाली सन्तानों को पाता है। ६. (याज्याभिः) = यज्ञ की क्रियाओं से (याज्ञा:) = यज्ञक्रियाओंवाली सन्तानों को और ७ (वषट्कारैः) = वाक्शक्ति के विकासों से (वषट्कारान्) = विकसित वाक्शक्तिवाली सन्तानों को प्राप्त करता है।
Essence
भावार्थ-माता-पिता का पाशविक आचरण सन्तानों को पशुतुल्य बना देता है।
Subject
पशुओं से पशुओं को