Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 19 / Mantra 17

95 Mantra
19/17
Devata- यज्ञो देवता Rishi- हैमवर्चिर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
वेद्या॒ वेदिः॒ समा॑प्यते ब॒र्हिषा॑ ब॒र्हिरि॑न्द्रि॒यम्। यूपे॑न॒ यूप॑ऽआप्यते॒ प्रणी॑तोऽअ॒ग्निर॒ग्निना॑॥१७॥

वेद्या॑। वेदिः॑। सम्। आ॒प्य॒ते॒। ब॒र्हिषा॑। ब॒र्हिः। इ॒न्द्रि॒यम्। यूपे॑न। यूपः॑। आ॒प्य॒ते॒। प्रणी॑तः। प्रनी॑त इति॒ प्रऽनी॑तः। अ॒ग्निः। अ॒ग्निना॑ ॥१७ ॥

Mantra without Swara
वेद्या वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हिरिन्द्रियम् । यूपेन यूपऽआप्यते प्रणीतोऽअग्निरग्निना ॥

वेद्या। वेदिः। सम्। आप्यते। बर्हिषा। बर्हिः। इन्द्रियम्। यूपेन। यूपः। आप्यते। प्रणीतः। प्रनीत इति प्रऽनीतः। अग्निः। अग्निना॥१७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. सोम के अधिष्ठाता, सोम का पूर्णरूप से नियन्त्रण करनेवाले माता-पिता यथेष्ट सन्तानों का लाभ करते हैं। (वेद्या) = [विद् ज्ञाने] ज्ञानी पुरुष से (वेदिः) = ज्ञानी सन्तान ही समाप्यते = प्राप्त की जाती है। माता-पिता ज्ञानप्रधान जीवनवाले हों तो सन्तानों में भी यही ज्ञान की रुचि उत्पन्न होती है। २. (बर्हिषा) = हृदयदेश से वासनाओं को उखाड़नेवाले पुरुष से (बर्हिः) = वासनाओं का उद्बर्हण [विनाश] करनेवाली और अतएव (इन्द्रियम्) = [इन्द्रियं वीर्यम्] वीर्यसम्पन्न सन्तान उत्पन्न की जाती है। ३. (यूपेन) = [यु मिश्रण - अमिश्रण] अच्छाइयों को अपने साथ जोड़नेवाले तथा बुराइयों को अपने से दूर करनेवाले पुरुष से (यूप) = सद्गुणसम्पन्न और असद्गुणरहित सन्तान होती है तथा ४. (अग्निना) = निरन्तर आगे बढ़ने की वृत्तिवाले पुरुष से (अग्निः) = उन्नतिशील सन्तान ही (प्रणीतः) = बनाया जाता है।
Essence
भावार्थ- सन्तान माता-पिता के अनुरूप होते हैं। ज्ञानी का ज्ञान सम्पन्न, निर्वासन का वासनाशून्य और शक्तिसम्पन्न, सद्गुणसम्पन्न का सद्गुणी तथा उन्नतिशील का उन्नतिशील सन्तान होता है।
Subject
सन्तान माता-पिता के अनुरूप