Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 9

77 Mantra
18/9
Devata- आत्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऊर्क् च॑ मे सू॒नृता॑ च मे॒ पय॑श्च मे॒ रस॑श्च मे घृ॒तं च॑ मे॒ मधु॑ च मे॒ सग्धि॑श्च मे॒ सपी॑तिश्च मे कृ॒षिश्च॑ मे॒ वृष्टि॑श्च मे॒ जैत्रं॑ च म॒ऽऔद्भि॑द्यं च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥९॥

ऊर्क्। च॒। मे॒। सू॒नृता॑। च॒। मे॒। पयः॑। च॒। मे॒। रसः॑। च॒। मे॒। घृ॒तम्। च॒। मे॒। मधु॑। च॒। मे॒। सग्धिः॑। च॒। मे॒। सपी॑ति॒रिति॒ सऽपी॑तिः। च॒। मे॒। कृ॒षिः। च॒। मे॒। वृष्टिः॑। च॒। मे॒। जैत्र॑म्। च॒। मे॒। औद्भि॑द्य॒मित्यौत्ऽभि॑द्यम्। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥९ ॥

Mantra without Swara
ऊर्क्च मे सूनृता च मे पयश्च मे रसश्च मे घृतञ्च मे मधु च मे सग्धिश्च मे सपीतिश्च मे कृषिश्च मे वृष्टिश्च मे जैत्रञ्च म औद्भिद्यञ्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

ऊर्क्। च। मे। सूनृता। च। मे। पयः। च। मे। रसः। च। मे। घृतम्। च। मे। मधु। च। मे। सग्धिः। च। मे। सपीतिरिति सऽपीतिः। च। मे। कृषिः। च। मे। वृष्टिः। च। मे। जैत्रम्। च। मे। औद्भिद्यमित्यौत्ऽभिद्यम्। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (ऊर्क् च मे) = मुझे बल व प्राणशक्ति प्राप्त हो तथा (सूनृता च मे) = [सु ऊन् ऋत] मेरी वाणी उत्तम, दुःख के परिहाणवाली तथा सत्य हो । २. इस शक्ति व मधुरवाणी की प्राप्ति के लिए (पयः च मे) = मैं दूध का प्रयोग करूँ और (रसः च मे) = फलों के रस का सेवन करूँ। ३. इसी उद्देश्य से (घृतं च मे) = मैं घृत का प्रयोग करूँ और (मधु च मे) = मैं शहद का सेवन करूँ। ४. इन वस्तुओं को मैं अकेला न खा लूँ, (अपितु सग्धिः च मे) = मेरा औरों के साथ मिलकर भोजन हो तथा (सपीतिश्च मे) = बन्धुओं के साथ मिलकर पीना हो । ५. इन भोज्य पदार्थों की प्राप्ति के लिए (कृषिः च मे) मैं कृषि को अपनाऊँ तथा (वृष्टिः च मे) = कृषि की सफलता के लिए मुझे इष्ट वृष्टि प्राप्त हो । ६. (जैत्रं च मे) = [जेतुर्भावः] इस वृष्टिजनित कृषि से उत्पन्न पदार्थों का सेवन मुझे विजय- सामर्थ्यवाला बनाये और (औद्भिद्यं च मे) = इस विजय - सामर्थ्य के लिए आम्रादि वृक्षों की उत्पत्ति मुझे प्राप्त हो। ये सब वस्तुएँ (यज्ञेन) = प्रभु- सम्पर्क द्वारा (कल्पन्ताम्) = मुझे सामर्थ्य - सम्पन्न बनाएँ ।
Essence
भावार्थ- मैं प्राणशक्ति सम्पन्न होऊँ और सूनृतवाणी का प्रयोग करूँ।
Subject
ऊर्क् औद्भिद्यम्