Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 74

77 Mantra
18/74
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भरद्वाज ऋषिः Chhand- निचृत त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒श्याम॒ तं काम॑मग्ने॒ तवो॒तीऽअ॒श्याम॑ र॒यिꣳ र॑यिवः सु॒वीर॑म्। अ॒श्याम॒ वाज॑म॒भि वा॒ज॑यन्तो॒ऽश्याम॑ द्यु॒म्नम॑जरा॒जरं॑ ते॥७४॥

अ॒श्याम॑। तम्। काम॑म्। अ॒ग्ने॒। तव॑। ऊ॒ती। अ॒श्याम॑। र॒यिम्। र॒यि॒व॒ इति॑ रयिऽवः। सु॒वीर॒मिति॑ सु॒ऽवी॑रम्। अ॒श्याम॑। वाज॑म्। अ॒भि। वा॒जय॑न्तः। अ॒श्याम॑। द्यु॒म्न॑म्। अ॒ज॒र॒। अ॒जर॑म्। ते॒ ॥७४ ॥

Mantra without Swara
अश्याम तेङ्काममग्ने तवोतीऽअश्याम रयिँ रयिवः सुवीरम् । अश्याम वाजमभि वाजयन्तो श्याम द्युम्नमजराजरन्ते ॥

अश्याम। तम्। कामम्। अग्ने। तव। ऊती। अश्याम। रयिम्। रयिव इति रयिऽवः। सुवीरमिति सुऽवीरम्। अश्याम। वाजम्। अभि। वाजयन्तः। अश्याम। द्युम्नम्। अजर। अजरम्। ते॥७४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र की समाप्ति पर कहा था कि वे प्रभु दिन-रात हमारी रक्षा करते हैं। प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं कि उस रक्षण से क्या होता है? सबसे प्रथम बात तो यह है कि हे (अग्ने) = हमारी सब उन्नतियों के साधक प्रभो! (तव ऊती) = आपके रक्षण से हम अपनी (तं कामम्) = उस-उस कामना को (अश्याम) = प्राप्त करें, जिस कामनावाले कि हम आपसे प्रार्थना करें ('यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु') = । एवं प्रभु-रक्षण का प्रथम लाभ यह है कि हमारी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं । २. हे (रयिवः) = सब धनों के स्वामिन्! हम (सुवीरम् रयिम्) = उत्तम वीरता को प्राप्त करानेवाले धन को (अश्याम) = प्राप्त करें। प्रभु के स्तवन से अलग होकर प्राप्त किया गया धन हमें विलास की ओर ले जाकर वीरता से रहित करता है। प्रभु - स्मरण के साथ धन हमारी शक्ति की वृद्धि का कारण बनता है। ३. हे प्रभो! आपके रक्षण में (वाजयन्तः) = [संग्रामयन्तः] कामादि वासनाओं के साथ संग्राम करते हुए हम (वाजम्) = शक्ति को (अभि अश्याम) = समन्तात् प्राप्त करें। वासनाओं को जीतने से शरीर में बल आएगा तथा मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि भी दीप्त होगी। इस प्रकार (अभि) = दोनों क्षेत्रों में शरीर व आत्मा के क्षेत्र में हम बलवान् होंगे। प्रभु की रक्षा में ही हम इस वासना संग्राम में विजयी बन पाएँगे। ४. हे (अजर) = कभी जीर्ण न होनेवाले प्रभो! हम (ते) = आपकी (अजरम्) = कभी भी जीर्ण न होनेवाली (द्युम्नम्) - ज्ञान की ज्योति को (अश्याम) = प्राप्त करें, ('पश्य देवस्य काव्यं न ममार न जीर्यति')। ५. इस प्रकार मन्त्रार्थ से स्पष्ट है कि प्रभु रक्षण से सब इच्छाओं की पूर्ति तथा धन प्राप्ति के साथ मनुष्य वीर बनता है। वासनाओं को जीतकर वह शरीर को ही सबल नहीं बनाता अपितु अपने मस्तिष्क को भी सशक्त करके प्रभु की अजर ज्ञान - ज्योति को प्राप्त करता है। 'वाज' शब्द बल व ज्ञान' दोनों अर्थ रखता है, अतः यह अपने में बल व ज्ञान को भरनेवाला 'भरद्वाज' कहलाता है। यह 'भरद्वाज' ही प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है।
Essence
भावार्थ- प्रभु के रक्षण से हम १. अपनी इष्ट कामनाओं को सिद्ध करनेवाले बनें। २. वीरतायुक्त धन के स्वामी हों, ३. वासनाओं के साथ संग्राम करके उनके विजय से शरीर में शक्ति व मस्तिष्क में ज्ञान को भरनेवाले हों, ४. हम उस अजर प्रभु की ज्ञान - ज्योति को प्राप्त करनेवाले हों।
Subject
प्रभु-रक्षण के चार लाभ