Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 73

77 Mantra
18/73
Devata- अग्निर्देवता Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पृ॒ष्टो दिा॒व पृ॒ष्टोऽअ॒ग्निः पृ॑थि॒व्यां पृ॒ष्टो विश्वा॒ऽओष॑धी॒रावि॑वेश। वै॒श्वा॒न॒रः सह॑सा पृ॒ष्टोऽअ॒ग्निः स नो॒ दिवा॒ स रि॒षस्पा॑तु॒ नक्त॑म्॥७३॥

पृ॒ष्टः। दि॒वि। पृ॒ष्टः। अ॒ग्निः। पृ॒थि॒व्याम्। पृ॒ष्टः। विश्वाः॑। ओष॑धीः। आ। वि॒वे॒श॒। वै॒श्वा॒न॒रः। सह॑सा। पृ॒ष्टः। अ॒ग्निः। सः। नः॒। दिवा॑। सः। रि॒षः। पा॒तु॒। नक्त॑म् ॥७३ ॥

Mantra without Swara
पृष्टो दिवि पृष्टोऽअग्निः पृथिव्याम्पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश । वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषस्पातु नक्तम् ॥

पृष्टः। दिवि। पृष्टः। अग्निः। पृथिव्याम्। पृष्टः। विश्वाः। ओषधीः। आ। विवेश। वैश्वानरः। सहसा। पृष्टः। अग्निः। सः। नः। दिवा। सः। रिषः। पातु। नक्तम्॥७३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र में कहा गया था कि 'प्रभु हमें रक्षा के लिए समीपता से प्राप्त हों । प्रस्तुत मन्त्र में उसी भावना को दृढ़ करते हुए कहते हैं कि (सः) = वे प्रभु (नः) = हमें (दिवा) = दिन में तथा (सः) = वे प्रभु (नक्तम्) = रात्रि में (रिषः) = हिंसा से (पातु) = बचाएँ। वे प्रभु दिन-रात हमारी रक्षा करें । २. ये प्रभु वे हैं जो (पृष्ट:) = जिज्ञासित होने पर [प्रच्छ जिज्ञासायां] (दिवि) = द्युलोक में, दीप्त होनेवाले सूर्य में दिखते हैं। ३. वे (अग्निः) = सारे संसार के अग्रेणी प्रभु (पृष्ट:) = जिज्ञासित होने पर (पृथिव्याम्) = [प्रथ विस्तारे] अन्तरिक्षलोक में अन्तरिक्षस्थ चन्द्र व मेघ आदि में दृष्टिगोचर होते हैं। ४. (पृष्ट:) = जिज्ञासित होने पर वे प्रभु (विश्वा ओषधीः) = आविवेश सब ओषधियों में प्रविष्ट दिखते हैं। इन विविध ओषधियों में उस सवितादेव की महिमा प्रकट होती है। ५. वे (वैश्वानरः अग्निः) = सब मनुष्यों के सञ्चालक [विश्वान् नरान् नयति] प्रभु (सहसा) = सहस् के द्वारा, बल के द्वारा (पृष्टः) = जिज्ञासित होते हैं। प्रभु का दर्शन निर्बलों को नहीं होता ('नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः') । ६. इस प्रकार प्रस्तुत मन्त्र में प्रभु के जिज्ञासु भक्त का वर्णन है। सर्वत्र प्रभु की महिमा का दर्शन करनेवाला यह व्यक्ति विलास से बचकर शक्ति का सञ्चय कर पाता है, इसमें सहनशीलता होती है। अपने इस 'सहस्' से ही यह प्रभु का प्रिय होता है। 'तेज' से 'शरीर की शोभा' प्राप्त होती है, 'वीर्य' से 'नीरोगता व दीर्घजीवन' का लाभ होता है, 'बल व ओज' से सफलता प्राप्त होती है, ज्ञान [मन्यु] से पवित्रता तथा प्रभु की ओर चलने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है और अन्त में 'सहस्' से 'प्रभु की प्राप्ति' होती है। इसकी रक्षा में हम सब बुराइयों का संहार करनेवाले 'कुत्स' [कुथ हिंसायाम्] बनते हैं, इस मन्त्र के ऋषि होते हैं।
Essence
भावार्थ- हम प्रभु के जिज्ञासु भक्त बनेंगे तो धीमे-धीमे सर्वत्र हमें उस प्रभु की महिमा दिखेगी।
Subject
जिज्ञासु भक्त