Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 72

77 Mantra
18/72
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वै॒श्वा॒न॒रो न॑ऽऊ॒तय॒ऽआ प्र या॑तु परा॒वतः॑। अ॒ग्निर्नः॑ सुष्टु॒तीरुप॑॥७२॥

वै॒श्वा॒न॒रः। नः॒। ऊ॒तये॑। आ। प्र। या॒तु॒। प॒रा॒वत॒ इति॑ परा॒ऽवतः॑। अ॒ग्निः। नः॒। सु॒ष्टु॒तीः। सु॒स्तु॒तीरिति॑ सुऽस्तु॒तीः। उप॑ ॥७२ ॥

Mantra without Swara
वैश्वानरो नऽऊतय आ प्र यातु परावतः । अग्निर्नः सुष्टुतीरुप ॥

वैश्वानरः। नः। ऊतये। आ। प्र। यातु। परावत इति पराऽवतः। अग्निः। नः। सुष्टुतीः। सुस्तुतीरिति सुऽस्तुतीः। उप॥७२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार 'जय' विजेता बनकर 'विश्वामित्र' - सभी के साथ स्नेह करनेवाला बनता है और प्रभु से प्रार्थना करता है कि (वैश्वानर:) = सब मनुष्यों का हित करनेवाला प्रभु (परावतः) = दूर देश से (नः ऊतये) = हमारे रक्षण के लिए (आ प्रयातु) = सर्वथा समीप देश में प्राप्त हो । अज्ञानवश जब हम प्रभु से दूर होते हैं, तब हमें भय आदि प्राप्त होते हैं तथा काम-क्रोधादि शत्रुओं के हम वशीभूत हो जाते हैं। ज्ञान होने पर हम उस प्रभु को अपने हृदय में अनुभव करते हैं, उससे हमें जहाँ अभय प्राप्त होता है, वहाँ हम काम-क्रोधादि के शिकार नहीं होते । २. (अग्निः) = हमारी सब उन्नतियों का साधक वह प्रभु (सुष्टुतीरुप) = हमसे की गई शोभन स्तुतियों के द्वारा [सुष्टुतिभिः] (नः) = हमारे (उप) = समीप उपस्थित हों। वे प्रभु हमारे रक्षक हों। यदि थोड़ा-सा विचार किया जाए तो इससे बढ़कर हमारा सौभाग्य क्या हो सकता है कि प्रभु हमारी रक्षा कर रहे हों, परन्तु यह होगा तभी जब [क] हम भी उस प्रभु की भाँति ही 'वैश्वानर' बनें। सभी का हित करनेवाले हों इस भावना को अपनाकर ही हम मन्त्र के ऋषि 'विश्वामित्र' होंगे। प्रभु की रक्षा का पात्र बनने का [ख] दूसरा साधन 'अग्नि' बनना है। हममें निरन्तर आगे बढ़ने की भावना हो। [ग] इस आगे बढ़ने के उद्देश्य से हम प्रभु की उत्तम स्तुति करनेवाले बनें [सुष्टुती ] । इन स्तुतियों से हमारे सामने एक लक्ष्य दृष्टि उत्पन्न होगी। यह लक्ष्य आँख से ओझल न होगा तो हम निरन्तर आगे बढ़ते चलेंगे।
Essence
भावार्थ - [क] हम सब प्राणियों के हित की भावना से कार्यों में प्रवृत्त हों। [ख] हममें आगे बढ़ने की प्रवृत्ति हो । [ग] प्रभु के उत्तम स्तवन में प्रवृत्त हों।
Subject
वैश्वानरः, विश्वामित्रः