Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 71

77 Mantra
18/71
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- जय ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः प॑रा॒वत॒ऽआ ज॑गन्था॒ पर॑स्याः। सृ॒कꣳ स॒ꣳशाय॑ प॒विमि॑न्द्र ति॒ग्मं वि शत्रू॑न् ताढि॒ वि मृधो॑ नुदस्व॥७१॥

मृ॒गः। न। भी॒मः। कु॒च॒र इति॑ कुऽच॒रः। गि॒रि॒ष्ठाः। गि॒रि॒स्था इति॑ गिरि॒ऽस्थाः। प॒रा॒वतः॑। आ। ज॒ग॒न्थ॒। पर॑स्याः। सृ॒कम्। स॒शायेति॑ स॒म्ऽशाय॑। प॒विम्। इ॒न्द्र॒। ति॒ग्मम्। वि। शत्रू॑न्। ता॒ढि॒। वि॒। मृधः॑। नु॒द॒स्व॒ ॥७१ ॥

Mantra without Swara
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आ जगन्था परस्याः । सृकँ सँशाय पविमिन्द्र तिग्मँवि शत्रून्ताढि वि मृधो नुदस्व ॥

मृगः। न। भीमः। कुचर इति कुऽचरः। गिरिष्ठाः। गिरिस्था इति गिरिऽस्थाः। परावतः। आ। जगन्थ। परस्याः। सृकम्। सशायेति सम्ऽशाय। पविम्। इन्द्र। तिग्मम्। वि। शत्रून्। ताढि। वि। मृधः। नुदस्व॥७१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र का 'शास' अपने पर शासन करनेवाला शत्रुओं पर विजय पाता है और 'जय' नामवाला होता है। यह जय (मृगः) = [ मृग अन्वेषणे] आत्मान्वेषण करनेवाला होता है। इस आत्मालोचन से यह 'इन्द्रिय, मन व बुद्धि' में छिपकर ठहरे हुए कामादि को ढूंढकर नष्ट करने का प्रयत्न करता है। २. (न भीमः) = अपनी कमियों को जानने के कारण ही यह भयंकर नहीं होता, इसे अभिमान व क्रूरता आदि दोष आक्रान्त नहीं करते। ३. (कुचरः) = यह सदा पृथिवी पर विचरनेवाला होता है, घमण्ड के कारण आकाश में नहीं उड़ता, डींगें नहीं मारता [Does not build castles in the air ] । ४. (गिरिष्ठाः) = सदा वेदवाणी में स्थित होता है - वेदोपदिष्ट मार्ग से चलता है। ५. (परावतः परस्या:) = दूर से दूर देश से भी आजगन्थ-लौट आता है। इसका जो मन सुदूर देशों में भटका होता है, उस मन को यह वहाँ से वापस ले- आता है, 'प्रत्याहार' की साधना करता है। ६. (सृकम्) = [सृ- कं] गति में आनन्द को (संशाय) = [ तीक्ष्णीकृत्य] बढ़ाकर, अर्थात् गति में, क्रियाशीलता में अधिक-से-अधिक आनन्द लेता हुआ (इन्द्र) = हे जीवात्मन्! ७. (पविम्) = अपने को पवित्र बनाने की भावना को (तिग्मम्) = तीव्र व ज्ञान से दीप्त करके, अर्थात् पवित्रता व ज्ञान को मिलाकर तू (शत्रून्) = इन कामादि शत्रुओं को (विताढि) = हिंसित कर तथा (मृधः) = इन हिंसक शत्रुओं को (विनुदस्व) = अपने से सुदूर धकेल दे।
Essence
भावार्थ- कामादि शत्रुओं को जीतने के लिए आवश्यक है कि हम [क] आत्मालोचन करें [मृग:], [ख] कल्पनाओं में न उड़ते रहकर पृथिवी पर विचरनेवाले बनें [कुचर :] [ग] 'गिरिष्ठा' बनें - वेदवाणी के अनुकूल चलें, [घ] क्रियाशीलता में आनन्द लें [सृकम्], [ङ] पवित्रता को ज्ञानदीप्त करें [ पविं तिग्मम्] ।
Subject
जय