Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 62

77 Mantra
18/62
Devata- विश्वकर्माग्निर्वा देवता Rishi- देवश्रवदेववातावृषी Chhand- निचृदार्ष्यनुस्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
येन॒ वह॑सि स॒हस्रं॒ येना॑ग्ने सर्ववेद॒सम्। तेने॒मं य॒ज्ञं नो॑ नय॒ स्वर्दे॒वेषु॒ गन्त॑वे॥६२॥

येन॑। वह॑सि। स॒हस्र॑म्। येन॑। अ॒ग्ने॒। स॒र्व॒वे॒द॒समिति॑ सर्वऽवेद॒सम्। तेन॑। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। नः॒। न॒य॒। स्वः᳖। दे॒वेषु॑। गन्त॑वे ॥६२ ॥

Mantra without Swara
येन वहसि सहस्रँयेनाग्ने सर्ववेदसम् । तेनेमँयज्ञन्नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे ॥

येन। वहसि। सहस्रम्। येन। अग्ने। सर्ववेदसमिति सर्वऽवेदसम्। तेन। इमम्। यज्ञम्। नः। नय। स्वः। देवेषु। गन्तवे॥६२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र में यह स्पष्ट है कि यजमान 'इष्ट' को करता है, तो अग्नि 'आपूर्त' को। अपने में पड़े हुए पदार्थों को अग्नि छोटे-छोटे कणों में विभक्त करके सर्वत्र फैला देता है। श्वासवायु के साथ उन कणों को सभी व्यक्ति अपने अन्दर लेते हैं और स्वास्थ्य आदि का लाभ करते हैं। दूसरे शब्दों में अग्नि हमारा ही भरण न करके हजारों का भरण करता है । मन्त्र में कहते हैं कि (अग्ने) = हे अग्ने ! (येन) = क्योंकि (सहस्त्रं वहसि) = तू हज़ारों का ही धारण करता है, इतना ही नहीं, (येन) = चूँकि यज्ञ से पर्जन्य [बादल] के द्वारा वृष्टि करके तू अन्नादि की उत्पत्ति से (सर्ववेदसम्) = सब धनों को (वहसि) = प्राप्त कराता है, (तेन) = इसलिए (इमं यज्ञम्) = इस यज्ञ को (नः) = हमें (नय) = प्राप्त करा । २. यज्ञ के दो लाभ बड़े स्पष्ट हैं [क] एक तो यज्ञ के द्वारा उस वस्तु को अकेला न खाकर मैं सहस्रों के साथ मिलकर खाता हूँ तथा [ख] यह यज्ञ उत्तम अन्नादि की उत्पत्ति से हमारी सम्पत्ति का संवर्धन करता है। ३. इन दो लाभों के अतिरिक्त वायुशुद्धि व रोगकृमि-संहार से नीरोगता होकर हमारा जीवन बड़ा सुखी हो जाता है। मन्त्र में प्रार्थना करते हैं कि इन यज्ञों के द्वारा (स्वः नय) = हमें सुख व स्वर्ग को प्राप्त करानेवाला हो और (देवेषु गन्तवे) = दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए ले-चल। इस यज्ञ से हमारी स्वार्थ की वृत्ति समाप्त होती है और हम आसुरवृत्तियों से ऊपर उठकर दैवीवृत्तियों में विचरणवाले होते हैं। इन दिव्य गुणों के कारण यशस्वी बनकर हम 'देवश्रव' बनते हैं और दिव्य गुणों में गमन के कारण 'देववात' कहलाते हैं। ये ही इस मन्त्र के ऋषि हैं।
Essence
भावार्थ - [१] अग्निहोत्र द्वारा हम अकेले न खाकर सहस्रों का भरण करते हैं । [२] इस अग्निहोत्र से अन्नादि की उत्पत्ति के द्वारा हमें सम्पूर्ण धन प्राप्त होता है। [३] वायुशुद्धि व नीरोगता से हमारा जीवन सुखी होता है, हमारा गृहस्थ स्वर्ग बन जाता है। [४] स्वार्थवृत्ति से ऊपर उठकर हम दिव्य गुणों को प्राप्त करते हैं।
Subject
सहस्र-वहन