Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 6

77 Mantra
18/6
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- भुरिगतिशक्वरी Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒तं च॑ मे॒ऽमृतं॑ च मेऽय॒क्ष्मं च॒ मेऽना॑मयच्च मे जी॒वातु॑श्च मे दीर्घायु॒त्वं च॑ मेऽनमि॒त्रं च॒ मेऽभ॑यं च मे सु॒खं च॑ मे॒ शय॑नं च मे सू॒षाश्च॑ मे सु॒दिनं॑ च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥६॥

ऋ॒तम्। च॒। मे॒। अ॒मृत॑म्। च॒। मे॒। अ॒य॒क्ष्मम्। च॒। मे॒। अना॑मयत्। च॒। मे॒। जी॒वातुः॑। च॒। मे॒। दी॒र्घा॒यु॒त्वमिति॑ दीर्घायु॒ऽत्वम्। च॒। मे॒। अ॒न॒मि॒त्रम्। च॒। मे॒। अभ॑यम्। च॒। मे॒। सु॒खमिति॑ सु॒ऽखम्। च॒। मे॒। शय॑नम्। च॒। सू॒षा इति॑ सुऽउ॒षाः। च॒। मे॒। सु॒दिन॒मिति॑ सु॒ऽदिन॑म्। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥६ ॥

Mantra without Swara
ऋतञ्च मे मृतञ्च मे यक्ष्मञ्च मे नामयच्च मे जीवातुश्च मे दीर्घायुत्वञ्च मे नमित्रञ्च मे भयञ्च मे सुखञ्च मे शयनञ्च मे सुषाश्च मे सुदिनठञ्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

ऋतम्। च। मे। अमृतम्। च। मे। अयक्ष्मम्। च। मे। अनामयत्। च। मे। जीवातुः। च। मे। दीर्घायुत्वमिति दीर्घायुऽत्वम्। च। मे। अनमित्रम्। च। मे। अभयम्। च। मे। सुखमिति सुऽखम्। च। मे। शयनम्। च। सूषा इति सुऽउषाः। च। मे। सुदिनमिति सुऽदिनम्। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र की समाप्ति 'सुकृतम्' पर थी। 'सुकृतम्' की ही व्याख्या प्रस्तुत मन्त्र में 'ऋत' शब्द से हुई है। (ऋतं च मे) = मेरे जीवन में 'ऋत' हो । ऋत वही है जो ठीक = right है। ठीक वही है जो ठीक स्थान व समय के अनुकूल है। इस ऋत के पालन से ही (अमृतं च मे) = मुझे अमृत की प्राप्ति हो । स्वाभाविक मृत्यु को छोड़कर जो रोगरूप मृत्यु हैं, उनसे मैं बचा रहूँ। मैं केवल 'जरा मृत्युवाला होऊँ। पूर्ण आयुष्य में होनेवाली जीर्णता से ही मेरा यह शरीर जाए । २. (अयक्ष्मं च मे) = ऋत के पालन से मुझमें धातुक्षयजनित रोग उत्पन्न न हों। (अनामयत् च मे) = सामान्य व्याधियों से राहित्य भी मुझे प्राप्त हो। ३. (जीवातुः च मे) = [येन जीवयति] जिससे दीर्घ जीवन प्राप्त होता है वह पथ्य भोजन मुझे प्राप्त हो । (दीर्घायुत्वं च मे) = उस पथ्य भोजन के सेवन से मैं दीर्घ जीवन को प्राप्त करूँ। ४. इस दीर्घ जीवन के लिए ही (अनमित्रं च मे) = मेरी किसी से शत्रुता न हो और (अभयं च मे) = मैं अभय को प्राप्त होऊँ। मन में होनेवाली शत्रुता व भय की भावना शरीर पर भी घातक प्रभाव उत्पन्न करती है । ५. (सुखं च मे) मैं शत्रुओं से भयरहित होकर सुखी जीवनवाला होऊँ। (शयनं च मे) = मैं सुख की नींद सो सकूँ। ६. रात्रि में सुखपूर्वक सोने के बाद मैं प्रातः तरोताजा होकर उठूं और (सूषाः च मे) = मेरा प्रातःकाल बड़ा उत्तम हो। मैं अपने प्रातः कृत्यों को उत्तमता से सम्पादित कर सकूँ, तथा (सुदिनं च मे) = मेरा सारा दिन यज्ञदानाध्ययनादि युक्त होकर सुन्दरता से बीते । ऋत से प्रारम्भ होकर सुदिन तक मेरा सब कुछ (यज्ञेन) = उस प्रभु के सम्पर्क से (कल्पन्ताम्) = सम्पन्न हो ।
Essence
भावार्थ- मैं ऋत के द्वारा अमृतत्व - अयक्ष्मत्व व अनामयत्व को सिद्ध करूँ। मेरा जीवन पथ्य- सेवन से दीर्घायु तक चले । शत्रुता व भय से रहित होकर मैं सुखी बनूँ एवं सुख की नींद सो सकूँ। मेरा प्रातः काल उत्तम हो तथा सारा दिन सुन्दरता से व्यतीत हो ।
Subject
ऋत + सुदिन