Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 57

77 Mantra
18/57
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गालव ऋषिः Chhand- निचृदार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒ष्टोऽअ॒ग्निराहु॑तः पिपर्त्तु नऽइ॒ष्टꣳ ह॒विः। स्व॒गेदं दे॒वेभ्यो॒ नमः॑॥५७॥

इ॒ष्टः। अ॒ग्निः। आहु॑त॒ इत्याहु॑तः। पि॒प॒र्त्तु॒। नः॒। इ॒ष्टम्। ह॒विः। स्व॒गेति॑ स्व॒ऽगा। इ॒दम्। दे॒वेभ्यः॑। नमः॑ ॥५७ ॥

Mantra without Swara
इष्टोऽअग्निराहुतः पिपर्तु न इष्टँ हविः । स्वगेदन्देवेभ्यो नमः ॥

इष्टः। अग्निः। आहुत इत्याहुतः। पिपर्त्तु। नः। इष्टम्। हविः। स्वगेति स्वऽगा। इदम्। देवेभ्यः। नमः॥५७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गालव प्रार्थना कहता है कि हमसे (अग्निः इष्टः) = यह अग्नि सदा किया जाए [यज्=संगतिकरण] । हम अग्नि को उत्तम घृत-हवि आदि पदार्थों से प्रीणित करनेवाले हों । २. (आहुतः) = हमारे द्वारा घृत-हवि आदि को प्राप्त कराया हुआ यह अग्नि (नः) = हमारा (पिपर्त्तु) = पालन व पूरण करनेवाला हो। यह आहुत अग्नि [क] वायुमण्डल की शुद्धि का साधन बनता है। [ख] यह रोगकृमियों का संहार करता है और इस प्रकार हमारे स्वास्थ्य का पालन करता है। [ग] यह अग्नि हमें सौमनस्य को देनेवाला होता है [घ] और वृष्टि के द्वारा उत्तम अन्न देकर हमारी आवश्यकताओं का पूरण करता है, अतः ३. हमारे अन्दर यज्ञ की वृत्ति बनी ही रहे और (नः) = हमें (हविः) = [ हु दानादनयोः] यज्ञों में धन का विनियोग करके यज्ञशेष को खाने की वृत्ति ही (इष्टम्) = प्रिय हो। हम सदा यज्ञशेष खानेवाले ही बनें। ५. इस प्रकार (इदं स्वगा) = यह हमारा जीवन (स्व) = आत्मा की ओर (गा) = जानेवाला है। हम भौतिकता की वृत्तिवाले न बन जाएँ। हम अपने जीवन में यज्ञिय वृत्ति को अपनाकर प्रभु की ओर चलें और (देवेभ्यः) = दिव्य गुणों के धारण के लिए (नमः) = सदा नम्रता का धारण करनेवाले हों, देवों के प्रति नतमस्तक हों।
Essence
भावार्थ- हम यज्ञशील बनकर 'स्व-गा' आत्मा की ओर चलनेवाले बनें। इस आत्मा की ओर चलते हुए हम उसी के छोटे रूप बनें। 'गा' और 'लव' बनें। गालव बनकर हम दिव्य गुणों के धारण के लिए नम्र बनें। नम्रता ही दिव्य गुणों की जननी है। इन दिव्य गुणों को पैदा करके ही हम महादेव को पाएँगे।
Subject
हम यज्ञशील बनें