Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 55

77 Mantra
18/55
Devata- इन्दु र्देवता Rishi- गालव ऋषिः Chhand- आर्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
विश्व॑स्य मू॒र्द्धन्नधि॑ तिष्ठसि श्रि॒तः स॑मु॒द्रे ते॒ हृद॑यम॒प्स्वायुर॒॑पो द॑त्तोद॒धिं भि॑न्त। दि॒वस्प॒र्जन्या॑द॒न्तरि॑क्षात् पृथि॒व्यास्ततो॑ नो॒ वृष्ट्या॑व॥५५॥

विश्व॑स्य। मू॒र्द्धन्। अधि॑। ति॒ष्ठ॒सि॒। श्रि॒तः। स॒मु॒द्रे। ते॒। हृद॑यम्। अ॒प्सु। आयुः॑ अ॒पः। द॒त्त॒। उ॒द॒धिमित्यु॑द॒ऽधिम्। भि॒न्त॒। दि॒वः। प॒र्जन्या॑त्। अ॒न्तरि॑क्षात्। पृ॒थि॒व्याः। ततः॑। नः॒। वृष्ट्या॑। अ॒व॒ ॥५५ ॥

Mantra without Swara
विश्वस्य मूर्धन्नधि तिष्ठसि श्रितः समुद्रे ते हृदयमप्स्वायुरपो दत्तोदधिम्भिन्त्त । दिवस्पर्जन्यादन्तरिक्षात्पृथिव्यास्ततो नो वृष्ट्याव ॥

विश्वस्य। मूर्द्धन्। अधि। तिष्ठसि। श्रितः। समुद्रे। ते। हृदयम्। अप्सु। आयुः अपः। दत्त। उदधिमित्युदऽधिम्। भिन्त। दिवः। पर्जन्यात्। अन्तरिक्षात्। पृथिव्याः। ततः। नः। वृष्ट्या। अव॥५५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (विश्वस्य) = सबके (मूर्द्धन्) = मूर्धास्थान में, अर्थात् सबसे आगे (अधितिष्ठसि) = तू स्थित होता है, अर्थात् गुणों को ग्रहण करते हुए व्यक्तियों में तू सबसे आगे बढ़ जाता है। ('मूर्द्धनि वा सर्वलोकस्य') सब लोकों के मस्तक पर यही तेरे जीवन का आदर्श वाक्य होता है। २. (श्रितः) = [श्रित् सेवायाम्, श्रितमस्य अस्तीति श्रितः] तू प्रभु की उपासना को अपनानेवाला होता है। इस प्रभु-उपासन से ही तुझमें दिव्य गुणों की वृद्धि होती है। ३. (ते हृदयम् समुद्रे) = तेरा हृदय सदा आनन्दमय प्रभु में होता है, अर्थात् तू जीवन को आनन्दमय बनाने के लिए संसार के सब कार्यों को करता हुआ भी अपने हृदय को प्रभु में ही रखता है। ४. इस प्रकार सदा प्रभु का स्मरण करता हुआ (आयुः) = अपने जीवन को अप्सु कर्मों में स्थापित करता है । ५. कर्मों को करता हुआ तू (अपः दत्त) = [ ददासि - द० ] अङ्ग-प्रत्यङ्ग को प्राणशक्ति देता है [आप:- रेतः प्राणाः] इन कर्मों से तेरे अङ्ग शक्तिशाली बनते हैं और इस प्रकार तू उन अङ्गों को प्राणशक्ति दे रहा होता है। ६. एक-एक अङ्ग को सप्राण करता हुआ तू उदधिं भिन्त [ भिनत्सि - द०] ज्ञान - समुद्र का विदारण करता है। विश्लेषणात्मक [ analytic] विधि से अपने ज्ञान को बढ़ानेवाला होता है। ७. (ततः) = अब ज्ञान को बढ़ाने के बाद [क] (दिवः) = अपने इस प्रकाशमय मस्तिष्क से [ख] (पर्जन्यात् अन्तरिक्षात्) = [परां तृप्तिं जनयति] सद्भावना व सद् व्यवहार से दूसरों की प्रकृष्ट तृप्ति को पैदा करनेवाले हृदयान्तरिक्ष से, तथा [ग] (पृथिव्या:) = [ प्रथ विस्तारे] विस्तृतशक्तिवाले शरीर से (वृष्ट्याव) = लोगों पर सुखों की वर्षा के द्वारा (नः) = हमें प्रीणित कर । प्रभु गालव से कहते हैं कि तू ज्ञान-सद्भावना व सत्कर्मों से लोकों के कष्टों के निवारण के द्वारा उनके जीवन को सुखी करेगा तो अपने इस व्यवहार से मुझे प्रसन्न कर रहा होगा।
Essence
भावार्थ- हम संसार में गुणों की दृष्टि से अपना स्थान प्रमुख बनाएँ। प्रभु का उपासन करें। हमारा हृदय प्रभु में हो, जीवन कर्मों में। अङ्ग-प्रत्यङ्ग को हम शक्ति प्राप्त कराएँ । ज्ञान - समुद्र का अवगाहन करें। दीप्त मस्तिष्क, तृप्तिप्रद हृदय व सशक्त शरीर से सभी को सुखी करते हुए हम प्रभु को आराधित करें।
Subject
प्रभु का प्रीणन