Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 53

77 Mantra
18/53
Devata- इन्दु र्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- आर्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इन्दु॒र्दुक्षः॑ श्ये॒नऽऋ॒तावा॒ हिर॑ण्यपक्षः शकु॒नो भु॑र॒ण्युः। म॒हान्त्स॒धस्थे॑ ध्रु॒वऽआ निष॑त्तो॒ नम॑स्तेऽअस्तु॒ मा मा॑ हिꣳसीः॥५३॥

इन्दुः॑। दक्षः॑। श्ये॒नः। ऋ॒तावे॑त्यृ॒तऽवा॑। हिर॑ण्यपक्ष॒ इति॒ हिर॑ण्यऽपक्षः। श॒कु॒नः। भु॒र॒ण्युः। म॒हान्। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धऽस्थे॑। ध्रु॒वः। आ। निष॑त्तः। निऽस॑त्त इति॒ निऽस॑त्तः। नमः॑। ते॒। अ॒स्तु॒। मा। मा॒। हि॒ꣳसीः॒ ॥५३ ॥

Mantra without Swara
इन्दुर्दक्षः श्येनऽऋतावा हिरण्यपक्षः शकुनो भुरण्युः । महान्त्सधस्थे धु्रवऽआनिषत्तो नमस्तेऽअस्तु मा मा हिँसीः ॥

इन्दुः। दक्षः। श्येनः। ऋतावेत्यृतऽवा। हिरण्यपक्ष इति हिरण्यऽपक्षः। शकुनः। भुरण्युः। महान्। सधस्थ इति सधऽस्थे। ध्रुवः। आ। निषत्तः। निऽसत्त इति निऽसत्तः। नमः। ते। अस्तु। मा। मा। हिꣳसीः॥५३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. छियालीसवें मन्त्र से प्रारम्भ करके प्रस्तुत मन्त्र में शुनःशेप के जीवन का उपसंहार करते हुए कहते हैं कि यह शुनःशेप (इन्दुः) = [ इदि परमैश्वर्ये] परमैश्वर्यवाला होता है। पिछले मन्त्र के अनुसार ज्ञान और बल-ये इसके अक्षयकोष होते हैं और इन्हीं कोषों से वस्तुत: ये (इन्दुः) = चन्द्रमा की भाँति सभी को आह्लादित करनेवाला होता है। २. (दक्षः) = अपने जीवन में सदा उत्साहवाला- दक्षता से कार्यों को करनेवाला होता है। ३.( श्येन:) = [श्यैङ् जगतौ] श्येन की भाँति यह अत्यन्त प्रशंसनीय गतिवाला होता है । ४. क्रियाशीलता के द्वारा ही यह (ऋतावा) = अपने जीवन में ऋत का अवन-रक्षण करता है। अनृत इसके जीवन में नहीं पनप पाता है । ५. (हिरण्यपक्ष:) = हितरमणीय ज्योति का यह परिग्रह करनेवाला होता है। [पक्ष परिग्रहम्] अथवा ज्ञान ही इसके पंख होते हैं उनसे यह आकाश में ऊपर उठता है, उन्नति करनेवाला होता है । ६. (शकुनः) = [ शक्नोति ] यह शक्तिशाली होता है। ज्ञान के साथ शक्ति की साधना करता है। ७. अपनी इस शक्ति से यह (भुरण्युः) = [बिभर्ति ] सबका भरण करता है। शक्ति की साधना करता है। शक्ति का विनियोग कभी भी उत्पीड़न में नहीं करता। ८. (महान्) = हृदय में यह विशाल होता है। ९. विशाल हृदय बनकर (सधस्थे) = परमेश्वर के साथ एक स्थान में स्थित होने के स्थान हृदय में (ध्रुव:) = स्थिर होकर चित्तवृत्ति का पूर्ण निरोध करके (आ निषत्तः) = सर्वथा स्थित होता है। १०. (नमस्ते अस्तु) = मेरे हृदय में स्थित तेरे लिए नमस्कार हो (मा मा हिंसी:) = हे प्रभो! आप मुझे हिंसित मत होने दीजिए। आपकी कृपा से मेरा जीवन अहिंसित हो। व्यर्थ जीवनवाला न होकर मैं अपने जीवन में उन्नति करता हुआ आप तक पहुँचनेवाला बनूँ और इस प्रकार सुखमय लोक का निर्माण करूँ।
Essence
भावार्थ- मैं 'इन्दु, दक्ष, श्येन, ऋतावा, हिरण्यपक्षः, शकुन, भुरण्युः व महान्' बनकर चित्तवृत्ति को ध्रुव करता हुआ हृदय में प्रभु के साथ स्थित होऊँ । प्रभु का दर्शन करता हुआ प्रभु के प्रति नतमस्तक होऊँ और इस प्रकार अपने जीवन को चरितार्थ करूँ। अव्यर्थ जीवनवाला मैं वास्तविक सुख का निर्माण करूँ।
Subject
सोने के पंखवाला पक्षी - 'हिरण्यपक्ष शकुन'