Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 48

77 Mantra
18/48
Devata- बृहस्पतिर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- भुरिगार्ष्युनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
रुचं॑ नो धेहि ब्राह्म॒णेषु॒ रुच॒ꣳ राज॑सु नस्कृधि। रुचं॒ विश्ये॑षु शू॒द्रेषु॒ मयि॑ धेहि रु॒चा रुच॑म्॥४८॥

रुच॑म्। नः॒। धे॒हि॒। ब्रा॒ह्म॒णेषु॑। रुच॑म्। राज॒स्विति॒ राज॑ऽसु। नः॒। कृ॒धि॒। रुच॑म्। विश्ये॑षु। शू॒द्रेषु॑। मयि॑। धे॒हि॒। रु॒चा। रुच॑म् ॥४८ ॥

Mantra without Swara
रुचन्नो धेहि ब्राह्मणेषु रुचँ राजसु नस्कृधि । रुचँविश्येषु शूद्रेषु मयि धेहि रुचा रुचम् ॥

रुचम्। नः। धेहि। ब्राह्मणेषु। रुचम्। राजस्विति राजऽसु। नः। कृधि। रुचम्। विश्येषु। शूद्रेषु। मयि। धेहि। रुचा। रुचम्॥४८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र के 'देवा' पद को ही यहाँ अनुवृत्त करके प्रार्थना इस रूप में है कि हे (देवाः) = सब देवो ! आप (नः) = हमारे राष्ट्र के (ब्राह्मणेषु) = ब्रह्मज्ञान के देनेवाले सब विद्वानों में (रुचम्) = ज्ञान की दीप्ति को (धेहि) = धारण कीजिए। एक-एक देव हमारे ब्राह्मणों को ज्ञान से दीप्त करनेवाला हो । २. (नः) = हमारे (राजसु) = रक्षणात्मक कर्मों से प्रजा का रञ्जन करनेवाले क्षत्रियों में (रुचम्) = बल की दीप्ति को (कृधि) = कीजिए। आपकी कृपा से हमारे क्षत्रिय दीप्त बलवाले होकर प्रजा रक्षणात्मक कार्यों से प्रजा का अनुरञ्जन करते हुए सचमुच 'राजा' इस अन्वर्थक नामवाले हों। ३. हे सब देवो! आप (विश्येषु) = हमारे सब वैश्यों में (रुचम्) = धन की दीप्ति को धारण कीजिए। ये सदा सुपथ से 'स्व' [धन] का संचय करते हुए स्वराष्ट्र को सम्पन्न व सुखी बनानेवाले हों। ४. हे देवो! आप (शूद्रेषु) = [शू द्रवति] शीघ्रता से कार्यों में द्रुत होनेवाले हमारे इन शूद्रों में (रुचम्) = श्रमजनित दीप्ति को धारण कीजिए। आपकी कृपा से ये सदा अनसूया [प्रसन्नता] से श्रम करनेवाले हों। अपने श्रम से ये ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्यों के कार्यों की पूर्ति में सहायक हों। ५. हे प्रभो! आप कृपया (मयि) = मुझमें (रुचा) = इन ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों व शूद्रों की 'ज्ञान, बल, धन व श्रम' की दीप्तियों से (रुचम्) = दीप्ति (धेहि) = स्थापित कीजिए ।
Essence
भावार्थ- हममें ब्राह्मणों की ज्ञान दीप्ति हो। हम क्षत्रियों के बल को धारण करें, वैश्यों की सुसम्पत्तिवाले हों। शूद्रों के श्रम को हम मान देनेवाले हों।
Subject
ब्रह्म + क्षत्रिय + विट्शूद्र