Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 47

77 Mantra
18/47
Devata- बृहस्पतिर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- आर्ष्युनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
या वो॑ दे॒वाः सूर्ये॒ रुचो॒ गोष्वश्वे॑षु॒ या रुचः॑। इन्द्रा॑ग्नी॒ ताभिः॒ सर्वा॑भी॒ रुचं॑ नो धत्त बृहस्पते॥४७॥

याः। वः॒। दे॒वाः। सूर्य्ये॑। रुचः॑। गोषु॑। अश्वे॑षु। याः। रुचः॑। इन्द्रा॑ग्नी। ताभिः॑। सर्वा॑भिः। रुच॑म्। नः॒। ध॒त्त॒। बृ॒ह॒स्प॒ते॒ ॥४७ ॥

Mantra without Swara
या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः । इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचं नो धत्त बृहस्पते ॥

याः। वः। देवाः। सूर्य्ये। रुचः। गोषु। अश्वेषु। याः। रुचः। इन्द्राग्नी। ताभिः। सर्वाभिः। रुचम्। नः। धत्त। बृहस्पते॥४७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (देवा:) = दिव्य गुणों से द्योतमान देवो ! (याः) = जो (वः) = आपकी (सूर्ये) = सूर्य में (रुचः) = दीप्तियाँ हैं, (ताभिः सर्वाभिः) = उन सब दीप्तियों से (नः) = हममें (रुचः) = दीप्ति को (धत्त) = धारण करो। (बृहस्पते) = [ब्रह्मणस्पते] हे सम्पूर्ण ज्ञान के अधिपति प्रभो! आपकी कृपा से ये सब देव - सब प्राकृतिक शक्तियाँ हमारे जीवन में इस प्रकार समन्वित हों कि हम दीप्त ज्ञानवाले बनें। सूर्य के समान हमारा ज्ञान दीप्तिवाला हो। २. हे (देवाः) = देवो! (या:) = जो (वः) = आपकी (गोषु) = गौवों में व ज्ञानेन्द्रियों में (रुचः) = दीप्तियाँ हैं (ताभिः सर्वाभिः) = उन सब दीप्तियों से (नः) = हममें (रुचः) = दीप्ति को (धत्त) = धारण करो। (अग्ने) = हे अग्नि के समान प्रकाशमान प्रभो ! सब दोषों का दहन करनेवाले प्रभो! आपकी कृपा से सब देव हमें इन गौओं के सात्त्विक दुग्ध से सात्त्विक ज्ञानेन्द्रियोंवाला बनाइए। हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति की रुचिवाली हों। ३. हे (देवा:) = हे देवो! (याः) = जो (वः) = आपकी (अश्वेषु) = घोड़ों में कर्मेन्द्रियों में (रुच:) = दीप्तियाँ है, (ताभिः सर्वाभिः) = उन सब दीप्तियों से (नः) = हममें (रुचम्) = दीप्ति को (धत्त) = धारण कीजिए । हे इन्द्र-बल के सब कार्यों को करनेवाले प्रभो! आपकी कृपा से मैं अश्वादि वाहनों का भ्रमण में यथोचित प्रयोग करता हुआ अपने में इस प्रकार शक्ति का वर्धन करूँ कि मेरी कर्मेन्द्रियाँ सदा दीप्तिमय कर्मों को करनेवाली हों । निरन्तर क्रियाशीलता से मेरी कर्मेन्द्रियाँ दीप्त रहें ।
Essence
भावार्थ - [क] बृहस्पति मुझे सूर्य के समान ज्ञान से दीप्त करे । [ख] अग्नि की कृपा से मैं उत्तम गौवों के सात्त्विक दुग्ध-प्रयोग से ज्ञान- ग्रहण - पटु ज्ञानेन्द्रियोंवाला बनूँ । [ग] इन्द्र के अनुग्रह से मैं अश्वों द्वारा उचित व्यायाम करता हुआ अपनी कर्मेन्द्रियों को सशक्त बनाऊँ। मेरे सब कार्य शक्तिशाली हों।
Subject
इन्द्राग्नी+बृहस्पति