Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 46

77 Mantra
18/46
Devata- अग्निर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- भुरिगार्ष्युष्णिक् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यास्ते॑ अग्ने॒ सूर्ये॒ रुचो॒ दिव॑मात॒न्वन्ति॑ र॒श्मिभिः॑। ताभि॑र्नोऽअ॒द्य सर्वा॑भी रु॒चे जना॑य नस्कृधि॥४६॥

याः। ते॒। अ॒ग्ने॒। सूर्ये॑। रुचः॑। दिव॑म्। आ॒त॒न्वन्तीत्या॑ऽत॒न्वन्ति॑। र॒श्मिभि॒रिति॑ र॒श्मिऽभिः॑। ताभिः॑। नः॒। अ॒द्य। सर्वा॑भिः। रु॒चे। जना॑य। नः॒। कृ॒धि॒ ॥४६ ॥

Mantra without Swara
यास्तेऽअग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः । ताभिर्नाऽअद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि ॥

याः। ते। अग्ने। सूर्ये। रुचः। दिवम्। आतन्वन्तीत्याऽतन्वन्ति। रश्मिभिरिति रश्मिऽभिः। ताभिः। नः। अद्य। सर्वाभिः। रुचे। जनाय। नः। कृधि॥४६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. शुनःशेप प्रभु की गतमन्त्र की प्रेरणा को सुनकर प्रार्थना करता है कि अग्ने हम सबको उन्नत करनेवाले प्रभो ! (याः) = जो (ते) = तेरी (सूर्ये) = सूर्य में (रुच:) = दीप्तियाँ हैं, जो दीप्तियाँ (दिवमातन्वन्ति) = प्रकाश को चारों ओर विस्तृत करती हैं, (ताभिः सर्वाभी: रश्मिभिः) = उन सब प्रकाश की किरणों से (नः) = हमें (रुचेः) = दीप्ति व प्रीति के लिए तथा (जनाय) = [ जनी प्रादुर्भावे] प्रादुर्भाव व विकास के लिए (कृधि) = कीजिए । २. [क] हमारा ज्ञान सूर्य की दीप्तियों के समान हो। [ख] यह ज्ञान हममें परस्पर प्रीति पैदा करनेवाला हो। वेद के शब्दों में ज्ञान तो है ही वह जो परस्पर संज्ञान व ऐकमत्य को पैदा करता है तथा हमारी शक्तियों के विकास का कारण बनता है। जिसको प्राप्त करके हम परस्पर लड़ने लगते हैं, वह ज्ञान न होकर 'अज्ञान' है।
Essence
भावार्थ - [क] सूर्य के समान हमारा ज्ञान दीप्त हो। [ख] हम इस ज्ञान से परस्पर प्रीतिवाले हों और [ग] यह ज्ञान हमारी शक्तियों के विकास का कारण बने ।
Subject
रुचे जनाय