Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 43

77 Mantra
18/43
Devata- विश्वकर्मा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- विराडार्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वक॑र्मा॒ मनो॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॑ऽऋ॒क्सा॒मान्य॑प्स॒रस॒ऽएष्ट॑यो॒ नाम॑। स न॑ऽइ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥४३॥

प्र॒जाप॑ति॒रिति॒ प्र॒जाऽप॑तिः। वि॒श्वक॒र्मेति॑ वि॒श्वऽक॑र्म्मा। मनः॑। ग॒न्ध॒र्वः। तस्य॑। ऋ॒क्सा॒मानीत्यृ॑क्ऽसा॒मानि॑। अ॒प्स॒रसः॑। एष्ट॑य॒ इत्याऽइ॑ष्टयः। नाम॑। सः। नः॒। इ॒दम्। ब्रह्म॑। क्ष॒त्रम्। पा॒तु॒। तस्मै॑। स्वाहा॑। वाट्। ताभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥४३ ॥

Mantra without Swara
प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गन्धर्वस्तस्यऽऋक्सामान्यप्सरसऽएष्टयो नाम । स नऽइदम्ब्रह्म क्षत्रम्पातु तस्मै स्वाहा वाट्ताभ्यः स्वाहा ॥

प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। विश्वकर्मेति विश्वऽकर्म्मा। मनः। गन्धर्वः। तस्य। ऋक्सामानीत्यृक्ऽसामानि। अप्सरसः। एष्टय इत्याऽइष्टयः। नाम। सः। नः। इदम्। ब्रह्म। क्षत्रम्। पातु। तस्मै। स्वाहा। वाट्। ताभ्यः। स्वाहा॥४३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. सम्राट् का कर्त्तव्य एक शब्द में यह है कि वह (प्रजापतिः) = प्रजा का पालक हो । प्रजा रक्षा के उद्देश्य से ही राजा ने उस उस कार्य को करना है। २. (विश्वकर्मा) = यह राजा सब कार्यों को करनेवाला हो। यह किसी कार्य को छोटा न समझे। ३. (मन:) = यह राजा अत्यन्त मननशील हो और सदा विचारपूर्वक ही कार्यों को करनेवाला हो। विशेषकर 'कानून बनाना व दण्ड देना' ये दो कार्य तो अत्यधिक विचार की अपेक्षा रखते हैं। ४. यह विचारशील राजा (गन्धर्वः) = वेदवाणी का धारण करनेवाला हो और उसके अनुसार इस राष्ट्रभूमि का धारण करे। ५. (तस्य) = उस राजा के (अप्सरसः) = अध्यक्ष लोग (ऋक्सामानि) = विज्ञान [ऋक्] व उपासना-[साम] -वाले हों। 'ऋक्' शब्द उनके ज्ञान व क्रिया का संकेत करता है और 'साम' श्रद्धा का सूचक है। इस विद्या व श्रद्धा के द्वारा (एष्टयः नाम) = [आ समन्तात् इष्टयो येषाम्] ये सदा यज्ञोंवाले होते हैं, उत्तम कर्मों को करनेवाले होते हैं। दूसरे शब्दों में इन अध्यक्ष लोगों के जीवन में ज्ञान, श्रद्धा व कर्म का सुन्दर समन्वय होता है। ये मस्तिष्क, हृदय व हाथों-सबकी शक्ति का विकास करते हैं । ६. (सः) = वह राजा (नः) = हमारे (इदं ब्रह्म क्षत्रम्) = इस ज्ञान व बल को (पातु) = सुरक्षित करे । ७. (तस्मै स्वाहा) = उस राजा के लिए हम (स्वः) = धन का कर के रूप में (हा) = त्याग करें। वह राजा (वाट्) = इस धन को फिर प्रजा को ही प्राप्त करानेवाला हो, प्रजाहित के लिए ही उसका विनियोग करे। ९. (ताभ्यः स्वाहा) = उन अध्यक्षों के लिए हम स्वार्थ का त्याग करते हैं, अपने आराम को छोड़कर उनके कार्यों में सहायक होते हैं।
Essence
भावार्थ - राजा अपना मूल कर्म 'प्रजा रक्षण' समझे। वह स्वयं सब कर्मों को करता हुआ प्रजा में श्रम के आदर को बढ़ाए।
Subject
प्रजापतिः विश्वकर्मा