Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 40

77 Mantra
18/40
Devata- चन्द्रमा देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- निचृदार्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
सु॒षु॒म्णः सूर्य॑रश्मिश्च॒न्द्रमा॑ गन्ध॒र्वस्तस्य॒ नक्ष॑त्राण्यप्स॒रसो॑ भे॒कुर॑यो॒ नाम॑। स न॑ऽइ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॑ स्वाहा॒ वाट् ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥४०॥

सु॒षु॒म्णः। सु॒सु॒म्न इति॑ सुऽसु॒म्नः। सूर्य॑रश्मि॒रिति॒ सूर्य॑ऽरश्मिः। च॒न्द्रमाः॑। ग॒न्ध॒र्वः। तस्य॑। नक्ष॑त्राणि। अ॒प्स॒रसः॑। भे॒कुर॑यः। नाम॑। सः। नः॒। इ॒दम्। ब्रह्म॑। क्ष॒त्रम्। पा॒तु॒। तस्मै॑। स्वाहा॑। वाट्। ताभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥४० ॥

Mantra without Swara
सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो भेकुरयो नाम । स नऽइदम्ब्रह्म क्षत्रम्पातु तस्मै स्वाहा वाट्ताभ्यः स्वाहा ॥

सुषुम्णः। सुसुम्न इति सुऽसुम्नः। सूर्यरश्मिरिति सूर्यऽरश्मिः। चन्द्रमाः। गन्धर्वः। तस्य। नक्षत्राणि। अप्सरसः। भेकुरयः। नाम। सः। नः। इदम्। ब्रह्म। क्षत्रम्। पातु। तस्मै। स्वाहा। वाट्। ताभ्यः। स्वाहा॥४०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. यह सम्राट् (सुषुम्ण:) = [शोभनं सुम्णं यस्य] उत्तम स्तोमोंवाला तथा प्रजा को उत्तम सुख पहुँचानेवाला होता है। वस्तुतः प्रजारञ्जनात्मक स्वधर्म से ही यह प्रभु का स्तवन करता है २. (सूर्यरश्मिः) = प्रभु के उपासन से यह सूर्य के समान ज्ञान की रश्मियोंवाला होता है ३. (चन्द्रमा:) = [चदि आह्लादे, चन्दति चन्दयति वा ] सदा प्रसन्न मनोवृत्तिवाला होता है और सारी प्रजा को आनन्दित करने का प्रयत्न करता है ५. (गन्धर्वः) = वेदवाणी का धारण करता है और उस वेद के अनुसार राष्ट्र का भी धारण करनेवाला बनता है । ५ (तस्य) = उस राजा के (अप्सरसः) = अध्यक्ष लोग [अप्सु सरन्ति] (नक्षत्राणि) = [नक्षन्ते त्रायन्ते] सदा गतिशील होते हैं और प्रजा का रक्षण करते हैं। इस प्रजा के रक्षणात्मक कार्य के लिए ही (भेकुरयः नाम) = [भाकुरयः] प्रजा के अन्दर प्रकाश फैलानेवाले होते हैं, अतः इनका नाम ही 'भेकुरि’ हो जाता है। । सूर्य के समान ज्ञान की रश्मियोंवाले होकर ये प्रजा के अज्ञानान्धकार को क्यों न दूर करेंगे? ६. (सः) = वह सम्राट् (नः) = हमारे (इदम्) = इस (ब्रह्म) = ज्ञान को तथा (क्षत्रम्) = बल को (पातु) = सुरक्षित करे । ७. (तस्मै स्वाहा) = उस राजा के लिए हम (स्व) = कररूप धन (हा) = देनेवाले हों। ८. (वाट्) = राजा उस कर को प्रजाहित में विनियुक्त करता हुआ उसे फिर से प्रजा को प्राप्त करानेवाला हो। ९. (ताभ्यः स्वाहा) = उस राजा के अध्यक्षों के लिए भी हम अपने आराम का त्याग करते हैं।
Essence
भावार्थ - राजा प्रजा को उत्तम राज्य-व्यवस्था के द्वारा आनन्दित करता हुआ सच्चा प्रभु-स्तवन करता है। सूर्य के समान ज्ञानरश्मियों को चारों ओर फैलाता है। स्वयं आनन्दमय मनोवृत्तिवाला होता हुआ प्रजा को आनन्दित करता है। वेदवाणी के अनुसार राष्ट्र का धारण करता है। उसके अध्यक्ष लोग भी गतिशील, प्रजा रक्षक व प्रकाश को चारों ओर फैलानेवाले होते हैं।
Subject
सुषुम्णः सूर्यरश्मिः