Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 4

77 Mantra
18/4
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- निचृदत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ज्यैष्ठ्यं॑ च म॒ऽआधि॑पत्यं च मे म॒न्युश्च॑ मे॒ भाम॑श्च॒ मेऽम॑श्च॒ मेऽम्भ॑श्च मे जे॒मा च॑ मे महि॒मा च॑ मे वरि॒मा च॑ मे प्रथि॒मा च॑ मे वर्षि॒मा च॑ मे द्राधि॒मा च॑ मे वृ॒द्धं च॑ मे॒ वृद्धि॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम्॥४॥

ज्यैष्ठ्य॑म्। च॒। मे॒। आधि॑पत्य॒मित्याधि॑ऽपत्यम्। च॒। मे॒। म॒न्युः। च॒। मे॒। भामः॑। च॒। मे॒। अमः॑। च॒। मे॒। अम्भः॑। च॒। मे॒। जे॒मा। च॒। मे॒। म॒हि॒मा। च॒। मे॒। व॒रि॒मा। च॒। मे॒। प्र॒थि॒मा। च॒। मे॒। व॒र्षि॒मा। च॒। मे॒। द्रा॒घि॒मा। च॒। मे॒। वृ॒द्धम्। च॒। मे॒। वृद्धिः॑। च॒। मे॒। य॒ज्ञेन॑। क॒ल्प॒न्ता॒म् ॥४ ॥

Mantra without Swara
ज्यैष्ठ्यञ्च मेऽआधिपत्यञ्च मे मन्युश्च मे भामश्च मे मश्च मे म्भश्च मे महिमा च मे वरिमा च मे प्रथिमा च मे वर्षिमा च मे द्राघिमा च मे वृद्धञ्च मे वृद्धिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥

ज्यैष्ठ्यम्। च। मे। आधिपत्यमित्याधिऽपत्यम्। च। मे। मन्युः। च। मे। भामः। च। मे। अमः। च। मे। अम्भः। च। मे। जेमा। च। मे। महिमा। च। मे। वरिमा। च। मे। प्रथिमा। च। मे। वर्षिमा। च। मे। द्राघिमा। च। मे। वृद्धम्। च। मे। वृद्धिः। च। मे। यज्ञेन। कल्पन्ताम्॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार जीवन को सशक्त बनाकर (ज्यैष्ठयं च मे) = मैं ज्येष्ठत्व का सम्पादन करनेवाला बनूँ और इसी ज्येष्ठता - सम्पादन के लिए (आधिपत्यं च मे) = मेरा आधिपत्य सम्पन्न हो, अर्थात् मैं इन्द्रियों, मन व बुद्धि का अधिपति बनूँ। २. इस आधिपत्य से (मन्युः च मे) = मेरा ज्ञान सशक्त हो तथा (भामः च मे) = तेजस्विता [Brightness, Lustre, Splendour] मुझे प्राप्त हो। ३. (अमः च मे) = मेरी प्राणशक्ति बल सम्पन्न हो और (अम्भः च मे) = [तुष्टि:] मुझमें आत्मसन्तोष विकसित हो, अथवा सफलता [Fruitfulness ] मेरी संगिनी बने । ४. (जेमा च मे) = मैं सदा विजयी बनूँ, जय - सामर्थ्य-सम्पन्न बनूँ और (महिमा च मे) = महत्त्व को प्राप्त करूँ। ५. (वरिमा च मे) = [उरोर्भाव :] = प्रजादि से मैं विशाल बनूँ । (प्रथिमा च मे) = [पृथोर्भावः] मेरे गृह-क्षेत्रादि का भी विस्तार हो। ६. (वर्षिमा च मे) = [वृद्धस्य भावः] मुझे दीर्घ जीवन प्राप्त हो और (द्राघिमा च मे) = [ दीर्घस्य भावः] मैं अविच्छिन्न वंशवाला, प्रजाओं से दीर्घकाल तक चलनेवाला होऊँ। ७. (वृद्धं च मे) = मुझे प्रभूत अन्न-धनादि प्राप्त हो और (वृद्धिः च मे कल्पन्ताम्) = विद्यादि गुणों से मेरा उत्कर्ष (यज्ञेन) = यज्ञ से, प्रभु के साथ मेल करने से सम्पन्न हो ।
Essence
भावार्थ- मैं जीवन में ज्येष्ठता का सम्पादन करूँ। ज्ञानी व तेजस्वी बनूँ । प्राणशक्ति - सम्पन्न व आत्मसन्तोषवाला होऊँ । विजय व महत्त्व को प्राप्त करूँ, परिवार व सम्पत्ति से बढूँ, दीर्घ जीवन व वंश - विस्तारवाला होऊँ। धन, विद्यादि गुणों से उत्कृष्ट बनूँ ।
Subject
ज्यैष्ठ्य+ वृद्धि